आरती अम्बे मैया की
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ,
आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ......
अदभुद तेज बदन पर सोहे,
तीनो लोक उजाला माँ,
मेरी मैया बनो खिवैया,
तेरी आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ....
एक भरोसा तेरो मैया,
दूजा नहीं सहारा माँ,
भक्तो के कल्याण करेआ,
आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ.......
रोग हरो माँ कष्ट हरो माँ,
दुःख से हमें बचाओ माँ,
विजय करो माँ बाँध बधेया,
आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ........
जो जन माँ की करे आरती,
कष्ट कभी ना पाता माँ,
दूध पूत भंडार भरइया,
आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ,
आरती उतारू माँ,
जय हो अम्बे मैया,
तेरी आरती उतारू माँ.......
श्रेणी : दुर्गा भजन
आरती अम्बे मैया की ~ मां दुर्गा जी की आरती ~ Jai Ambe Gauri Aarti ~ Shivranjani Tiwari
“आरती अम्बे मैया की” एक श्रद्धापूर्ण मां दुर्गा की आरती है, जिसमें भक्त मां अम्बे की आराधना करते हुए उनकी महिमा, शक्ति और करुणा का गुणगान करता है। आरती की मुख्य पंक्ति “जय हो अम्बे मैया, तेरी आरती उतारू माँ” माता के प्रति भक्त की श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करती है। पूरे भजन में भक्त माता के सामने दीप और आरती अर्पित करते हुए उनके आशीर्वाद की कामना करता है।
इस आरती में मां के दिव्य स्वरूप और तेज का सुंदर वर्णन मिलता है। “अद्भुद तेज बदन पर सोहे, तीनों लोक उजाला” जैसी पंक्तियों में माता को ऐसी दिव्य शक्ति के रूप में देखा गया है जिनके तेज से तीनों लोक प्रकाशित होते हैं। इसके साथ भक्त माता को अपना “खिवैया” कहता है, अर्थात जीवन की कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शन करके भक्त को सही दिशा और सुरक्षित किनारे तक पहुंचाने वाली शक्ति।
आरती का एक महत्वपूर्ण भाव एकमात्र माता पर विश्वास और पूर्ण शरणागति है। “एक भरोसा तेरो मैया, दूजा नहीं सहारा” में भक्त स्पष्ट करता है कि उसके लिए माता ही सबसे बड़ा सहारा हैं। वह मां से अपने भक्तों के कल्याण की प्रार्थना करता है और स्वयं को पूरी तरह उनके चरणों में समर्पित करता है। यह पंक्ति भक्त और देवी के बीच गहरे विश्वास को दर्शाती है।
अगले चरण में माता को रोग और कष्ट हरने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। भक्त उनसे दुखों से बचाने और जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करता है। “विजय करो” का भाव यह है कि माता की कृपा से भक्त कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्राप्त करे। इस प्रकार आरती में माता की करुणामयी और रक्षक स्वरूप की स्तुति की गई है।
अंतिम भाग में माता की आरती करने के फल का वर्णन किया गया है। भक्त की आस्था के अनुसार जो व्यक्ति श्रद्धा से मां की आरती करता है, उसे कष्टों से रक्षा और माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। “दूध पूत भंडार भरइया” जैसी लोकभक्ति की पंक्ति परिवार में सुख-समृद्धि, संतान और अन्न-धन की पूर्णता की पारंपरिक कामना को व्यक्त करती है। यह आरती को केवल स्तुति न रखकर भक्त की मंगलकामना से भी जोड़ देती है।