हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
शरणा तेरा है ओ शरणा तेरा है
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
ओ शरणा तेरा है आसरा तेरा है
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
मैया है ब्रह्मा की पुत्री लेकर ज्ञान स्वर्ग से उतरी -
ओ आज थारी कथा बना दुयु सुथरी प्रथम मनाया है......x2
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
ओ शरणा तेरा है आसरा तेरा है
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
मैया तेरा भवन बड़ा जाली का हर गूथ लाया है माली का
ओ धयान धार कलकत्ते वाली का पुष्प चढ़ाया है.....x2
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
मैया तूने महिसासुर को मारा अपने बल के धरण पछाडया
ओ हाथ लिए खांडा रू दारा असुर सहारा........x2
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
ओ शरणा तेरा है आसरा तेरा है
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
कहता शंकर जटिली वाला हरदम रत मैया की माला
ओ खल तेरे हिरदय का ताला विद्याधर पाया है......x2
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
ओ शरणा तेरा है आसरा तेरा है
हे मंगल की मूल भवानी शरणा तेरा है
बोलो नाथ जी महाराज की जय
रति नाथ जी भजन
श्रेणी : दुर्गा भजन
हे मंगल की मूल भवानी,शरणा तेरा ह ||श्री चीमा बाबा की मधुर वाणी || He mangal ki mul bhawani sharna te
“हे मंगल की मूल भवानी, शरणा तेरा है” एक पारंपरिक भाव वाला दुर्गा भजन है, जिसमें मां भवानी को मंगल की मूल शक्ति और भक्तों की शरणस्थली के रूप में स्मरण किया गया है। भजन की मुख्य पंक्ति “शरणा तेरा है, आसरा तेरा है” भक्त की पूर्ण शरणागति को व्यक्त करती है। भक्त माता के चरणों में अपना विश्वास रखते हुए उनसे संरक्षण और कृपा की प्रार्थना करता है।
इस भजन का मुख्य भाव श्रद्धा, शरणागति और मां भवानी की शक्ति का गुणगान है। “मंगल की मूल भवानी” कहकर माता को शुभता और कल्याण की आधारशक्ति के रूप में संबोधित किया गया है। भक्त के लिए मां ही आश्रय हैं और उन्हीं की कृपा से जीवन में मंगल होने की भावना इस भजन में बार-बार दिखाई देती है।
एक अंतरे में माता को ब्रह्मा की पुत्री और ज्ञान लेकर स्वर्ग से उतरने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है। इसके बाद माता की कथा और उनकी पूजा का उल्लेख आता है। “ध्यान धार कलकत्ते वाली का” जैसी पंक्ति से काली/कलकत्ते वाली देवी के स्वरूप की ओर भी संकेत मिलता है। पुष्प चढ़ाने और ध्यान करने का भाव माता की विधिपूर्वक आराधना तथा भक्त की श्रद्धा को दर्शाता है।
भजन में महिषासुर वध का भी वर्णन मिलता है। माता को शक्तिशाली योद्धा स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्होंने महिषासुर का संहार किया। हाथ में खांडा लेकर असुरों का नाश करने वाली भवानी का यह स्वरूप दुर्गा की शक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। इस अंतरे के कारण भजन में माता के करुणामयी स्वरूप के साथ-साथ उनके वीर और रक्षक स्वरूप की भी झलक दिखाई देती है।
अंतिम हिस्से में “शंकर जटिली वाला” नाम का उल्लेख आता है और माता की माला जपने तथा उनके ध्यान में रहने की भावना व्यक्त होती है। “हृदय का ताला” और विद्याधर प्राप्त होने जैसी पंक्तियां भक्ति के माध्यम से आध्यात्मिक कृपा और ज्ञान प्राप्त होने के भाव से जुड़ी दिखाई देती हैं। अंत में “बोलो नाथ जी महाराज की जय” और “रति नाथ जी भजन” का उल्लेख है, जिससे यह किसी विशेष स्थानीय भजन-परंपरा या संत/महाराज की प्रस्तुति से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है।