मंदिर में रहती हो मईया
मंदिर में रहती हो मईया,
कभी बाहर भी आया जाया करो,
मैं रोज तेरे घर आती हु कभी तुम भी मेरे घर आया जाया करो,
भगतो पे किरपा करदो मईया,
तेरे दरबार खड़ी हु मईया,
मुज्पे भी किरपा बरसा जाओ,
मेरी पार लगा दो तुम नैया,
मैं रोज तेरे घर आती हु कभी तुम भी मेरे घर आया जाया करो,
तेरी जोत जला के बेठी हु,
तेरे दर्शन को माँ तरसी हु,
एक बार तो मईया आ जाओ,
तेरे बिन आँगन सुना है
मैं रोज तेरे घर आती हु.............
मेरे नैना झर झर बहते है,तेरे दरस को ही माँ तरसे है
इन नैनो में तुम बस जाओ,
मेरा जीवन सफल ही हो जाये
मैं रोज तेरे घर आती हु.........
श्रेणी : दुर्गा भजन
MAIYA KE DEEWANE |MANDIR MAIN RAHTI HO|KRISHNA PANT|MUMAL YADAV
“मंदिर में रहती हो मईया” एक भावुक और मधुर दुर्गा भजन है, जिसमें भक्त मां को अपने घर आने के लिए प्रेमपूर्वक बुलाता है। भजन का मूल भाव यह है कि भक्त रोज मां के मंदिर में जाकर उनके दर्शन और पूजा करता है, लेकिन उसके मन में इच्छा है कि एक दिन मां स्वयं उसके घर भी आएं और अपने आशीर्वाद से उसके घर-आंगन को पवित्र करें। इसमें भक्त और माता के बीच मां-बच्चे जैसा आत्मीय संबंध दिखाई देता है।
भजन की शुरुआत बहुत ही सरल लेकिन भावपूर्ण प्रश्न से होती है—“मंदिर में रहती हो मईया, कभी बाहर भी आया जाया करो।” भक्त कहता है कि वह रोज माता के घर यानी मंदिर में आता है, इसलिए कभी माता भी उसके घर आ जाएं। यह किसी औपचारिक पूजा से अधिक प्रेम और अपनत्व की भावना है। भक्त मां को दूर विराजमान देवी के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार की सदस्य और अपनी मां के रूप में महसूस करता है।
अगले अंतरे में भक्त माता के दरबार में खड़े होकर कृपा की प्रार्थना करता है। “मेरी पार लगा दो तुम नैया” जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति और माता के सहारे का प्रतीक है। भक्त को विश्वास है कि माता की कृपा से उसके जीवन की परेशानियां दूर हो सकती हैं और उसे सही मार्ग मिल सकता है। इसलिए वह बार-बार मां से अपने ऊपर कृपा बरसाने की विनती करता है।
भजन में ज्योत जलाने और दर्शन की लालसा का भाव भी बहुत सुंदर तरीके से आया है। भक्त मां की ज्योत जलाकर उनके आने की प्रतीक्षा करता है और कहता है कि उनके बिना उसका आंगन सूना है। यहां आंगन केवल घर का स्थान नहीं, बल्कि भक्त के हृदय और जीवन का प्रतीक भी माना जा सकता है। मां के आने से जीवन में खुशी, पूर्णता और आध्यात्मिक प्रकाश आने की भावना व्यक्त होती है।
अंतिम अंतरे में भक्त की दर्शन की तीव्र इच्छा और भी स्पष्ट हो जाती है। “मेरे नैना झर-झर बहते हैं” के माध्यम से माता के दर्शन के लिए भक्त की भावुकता दिखाई गई है। वह चाहता है कि मां उसके नयनों और हृदय में बस जाएं, जिससे उसका जीवन सफल हो जाए। यह पंक्ति भक्ति में प्रेम, विरह और दर्शन की लालसा—तीनों भावों को एक साथ प्रस्तुत करती है।