शेरावाली को मनाने हम भी आए है
शेरावाली को मनाने,
हम भी आए है,
हम भी आए है मैया,
हम भी आए है,
शेरावाली को मनानें,
हम भी आए है ।।
लाल है चोला लाल चुनरिया,
लाल माथे की बिंदी,
भगत तेरे हिंदी पंजाबी,
बंगाली और सिंधी,
तेरी ज्योत जगाने,
हम भी आए है,
हम भी आए है मैया,
हम भी आए है,
शेरावाली को मनानें,
हम भी आए है ।।
हरा है पीपल हरियल पत्ता,
ऊपर तोता बोले,
हरी मैया ने पहनी चूड़ियां,
देख के मनवा डोले,
तेरा दर्शन पाने,
हम भी आए है,
हम भी आए है मैया,
हम भी आए है,
शेरावाली को मनानें,
हम भी आए है ।।
जो भी आशा लेकर आए,
नहीं आस को मेटे,
बांझ नारियों के मैया जी,
गोद खिलावे बेटे,
फूल श्रद्धा के चढ़ाने,
हम भी आए है,
हम भी आए है मैया,
हम भी आए है,
शेरावाली को मनानें,
हम भी आए है ।।
चरणों में तेरे गंगा बहती,
पर्वत ऊपर डेरा,
नजर करम की कर दो मैया,
दास हूँ मैं भी तेरा,
धुनि द्वारे पे रमाने,
हम भी आए है,
हम भी आए है मैया,
हम भी आए है,
शेरावाली को मनानें,
हम भी आए है ।।
शेरावाली को मनाने,
हम भी आए है,
हम भी आए है मैया,
हम भी आए है,
शेरावाली को मनानें,
हम भी आए है ।।
श्रेणी : दुर्गा भजन
Sherawali Ko Manane Hum Bhi Aaye Hain
“शेरावाली को मनाने हम भी आए है” एक श्रद्धापूर्ण दुर्गा भजन है, जिसमें भक्त मां शेरावाली के दरबार में आकर उनकी आराधना, ज्योत और दर्शन की इच्छा व्यक्त करता है। भजन की मुख्य पंक्ति “शेरावाली को मनाने, हम भी आए हैं” भक्त के उत्साह और माता के प्रति प्रेम को दर्शाती है। यहां माता को प्रसन्न करने के लिए भक्त स्वयं उनके दरबार में पहुंचने और श्रद्धा से पूजा-अर्चना करने की भावना प्रकट करता है।
भजन के पहले अंतरे में माता के लाल चोले, लाल चुनरिया और लाल बिंदी का सुंदर वर्णन मिलता है। लाल रंग यहां माता की शक्ति, भक्ति और देवी स्वरूप की पारंपरिक छवि से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। इसके साथ ही “भगत तेरे हिंदी पंजाबी, बंगाली और सिंधी” कहकर भजन माता की भक्ति की व्यापकता को दर्शाता है। अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं के भक्त एक ही माता के चरणों में श्रद्धा से एकत्र होते हैं और उनकी ज्योत जलाते हैं।
अगले अंतरे में पीपल के हरे पत्ते, तोते की आवाज और माता की हरी चूड़ियों जैसे प्राकृतिक और पारंपरिक दृश्यों का उल्लेख है। इन पंक्तियों से भजन में एक लोकभक्ति और मंदिर के आसपास के वातावरण की सुंदर छवि बनती है। भक्त माता के दर्शन के लिए आया है और उनके स्वरूप को देखकर उसका मन आनंद और श्रद्धा से भर जाता है। यहां दर्शन की लालसा को भजन का एक प्रमुख भाव बनाया गया है।
भजन में माता को आशा लेकर आने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी करने वाली शक्ति के रूप में भी स्मरण किया गया है। “जो भी आशा लेकर आए, नहीं आस को मेटे” जैसी पंक्तियों में माता पर भक्त के विश्वास को व्यक्त किया गया है। आगे संतान की इच्छा रखने वाली महिलाओं के संदर्भ में माता से कृपा की प्रार्थना की गई है। यह लोकभक्ति में प्रचलित उस आस्था को दर्शाता है जिसमें भक्त अपनी पारिवारिक और व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए माता के चरणों में प्रार्थना करता है।
अंतिम अंतरे में माता के पर्वतीय धाम और पवित्र वातावरण की छवि सामने आती है। “चरणों में तेरे गंगा बहती, पर्वत ऊपर डेरा” जैसी पंक्तियां माता को पर्वतों पर विराजमान देवी के रूप में चित्रित करती हैं। भक्त स्वयं को माता का दास मानकर उनसे अपनी ओर कृपादृष्टि करने की विनती करता है। “धुनि द्वारे पे रमाने” में साधना और भक्ति के वातावरण का भाव दिखाई देता है, जिससे भजन की आध्यात्मिक अनुभूति और गहरी हो जाती है।