तोरी बगिया में आम की डाल
तोरी बगिया में आम की डाल,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
बगिया में माई आसन लागो,
आसन बैठो आन,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
बाग़ में तोरी झूला डरो है,
झूला झूलो आन,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
बाग में भोजन थाल लगी है,
जीमो जीमो आन,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
बाग में तोरी दुखिया बैठे,
विनती सुनलो आन,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
‘राजेंद’ भेंट लये ठाड़े हैं,
भेंट लो जल्दी आन,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
तोरी बगिया में आम की डाल,
कोयल बोले कुहू कुहू ॥
श्रेणी : दुर्गा भजन
तोरी बगिया में आम की डाल कोयल बोले कुहू कुहू।।
“तोरी बगिया में आम की डाल” एक सरल और लोक-भावना से जुड़ा हुआ दुर्गा भजन है, जिसमें भक्त मां को अपनी बगिया में आने और वहां विराजने के लिए प्रेमपूर्वक आमंत्रित करता है। भजन में आम की डाल पर बैठी कोयल की “कुहू-कुहू” की मधुर आवाज का सुंदर प्रयोग किया गया है, जिससे पूरी रचना में गांव-देहात और प्राकृतिक वातावरण जैसा सहज एवं आत्मीय भाव बनता है।
भजन का मुख्य भाव माता के प्रति प्रेम, आतिथ्य, विनम्र आमंत्रण और भक्ति का है। भक्त मां से कहता है कि उसकी बगिया में आसन तैयार है और मां आकर वहां विराजें। “आसन बैठो आन” जैसी पंक्तियां माता को अपने घर-आंगन की अतिथि नहीं, बल्कि अपनी अत्यंत प्रिय मां के रूप में बुलाने की भावना प्रकट करती हैं। आम की डाल और कोयल की आवाज इस भक्ति को लोकगीत जैसी मधुरता प्रदान करती है।
इसके बाद भक्त मां के लिए झूला तैयार होने की बात करता है और उनसे आकर झूला झूलने का आग्रह करता है। यह दृश्य माता को एक स्नेहमयी मां के रूप में देखने की भावना को दर्शाता है। इसी तरह बाग में भोजन की थाल सजाकर भक्त माता को भोजन करने के लिए आमंत्रित करता है। भारतीय भक्ति परंपरा में भगवान या देवी को अपने घर बुलाकर उन्हें भोजन, आसन और अन्य सेवाएं अर्पित करना प्रेम और सेवा-भाव का प्रतीक माना जाता है।
भजन का सबसे भावुक पक्ष उस पंक्ति में दिखाई देता है जहां भक्त स्वयं को “दुखिया” कहकर माता से अपनी विनती सुनने के लिए कहता है। यहां पूरी रचना का भाव केवल माता का स्वागत करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भक्त अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और मन की बात भी मां के सामने रखना चाहता है। उसे विश्वास है कि मां उसकी विनती सुनेंगी और उसके दुखों में सहारा देंगी।
अंतिम अंतरे में “राजेंद” नाम का उल्लेख आता है—“‘राजेंद’ भेंट लये ठाड़े हैं, भेंट लो जल्दी आन।” यह संभवतः रचना या भजन से जुड़े व्यक्ति का नाम हो सकता है, लेकिन उपलब्ध बोलों में उनकी भूमिका स्पष्ट नहीं की गई है। इसलिए उन्हें निश्चित रूप से गीतकार या मूल रचनाकार बताना उचित नहीं होगा। भजन के बोलों में किसी अन्य लेखक या गायक का नाम भी स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है।
कुल मिलाकर “तोरी बगिया में आम की डाल” माता को अपने बाग और घर के वातावरण में प्रेमपूर्वक बुलाने वाला एक लोक-रंग से युक्त दुर्गा भजन है। आम की डाल, कोयल की कुहू-कुहू, झूला, भोजन की थाल और भक्त की विनती—ये सभी तत्व मिलकर माता और भक्त के बीच के आत्मीय रिश्ते को सामने लाते हैं। इसमें बड़ी-बड़ी धार्मिक कथाओं के बजाय सरल ग्रामीण परिवेश और मां के प्रति सहज प्रेम को भक्ति का माध्यम बनाया गया है।