लक्ष्मी नाथ माने प्यारो लागे, Lakshmi Naath Maane Pyaro Laage

लक्ष्मी नाथ माने प्यारो लागे



लक्ष्मी नाथ माने , प्यारो लागे,
चार भुजा रो नाथ,
'म्हारो, चित चरणों में राख xll'-ll

मोर मुकट, सिर छत्र विराजे,
कानों में थारे, कुण्डल साजे ll
ग़ल हीरों रो, हार हज़ारी,
भगतों ने हिवड़े लगाए,
'म्हारो, चित चरणों में राख xll'
लक्ष्मी नाथ माने.........

रत्न सिँहासन, आप विराजो,
राधा रुक्मणि, संग में विराजे ll
चरन धोए, चरनामृत पीऊँ,
मगन रहूँ दिन रात,
'म्हारो, चित चरणों में राख xll'
लक्ष्मी नाथ माने.........

माखन मिश्री रा, भोग लगाऊँ,
हाथ जोड़, तने अर्ज़ सुनाऊँ ll
सुबह शाम, थोरा दर्शन पाऊँ,
खुशियाँ मनाऊँ दिन रात,
'म्हारो, चित चरणों में राख xll'
लक्ष्मी नाथ माने.........

दर्शन बिन दोए, अख्खियाँ प्यासी,
दरस देवो नी, द्वारिका रा वासी ll
रात दिन, थोरा गुण गाऊँ,
कर दो भव से पार,
'म्हारो, चित चरणों में राख xll'
लक्ष्मी नाथ माने.........



श्रेणी : विष्णु भजन
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"लक्ष्मी नाथ माने प्यारो लागे" एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण विष्णु भजन है, जिसमें भक्त की गहरी श्रद्धा, प्रेम, और समर्पण की भावना स्पष्ट रूप से झलकती है। यह भजन भगवान श्रीविष्णु के दिव्य स्वरूप का अत्यंत सुंदर चित्रण करता है और उनके चरणों में चित्त लगाने की परम भावना को दर्शाता है।

भजन की आरंभिक पंक्ति “लक्ष्मी नाथ माने, प्यारो लागे” यह बताती है कि भगवान लक्ष्मीपति विष्णु कितने प्रिय लगते हैं, और यह प्रियता केवल बाह्य स्वरूप की नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से अनुभव की गई है। “चार भुजा रो नाथ, म्हारो चित चरणों में राख” — यह पंक्ति एक सच्चे भक्त की विनम्र प्रार्थना है कि उसका चित्त सदा प्रभु के पवित्र चरणों में लगा रहे।

भजन में मोर मुकुट, कुंडल, हीरों के हार, रत्न सिंहासन, राधा-रुक्मणि का साथ — यह सब श्रीहरि के वैभव और दिव्यता का सुंदर वर्णन करते हैं। ये दृश्य न केवल आँखों के लिए सुखद हैं, बल्कि हृदय में भी दिव्य अनुभूति उत्पन्न करते हैं।

"चरन धोए, चरनामृत पीऊँ, मगन रहूँ दिन रात" — यह पंक्ति उस भक्त की भावना है जो केवल प्रभु की सेवा में ही पूर्ण तृप्ति अनुभव करता है।

भजन में जहाँ माखन-मिश्री का भोग है, वहीं “सुबह शाम थोरा दर्शन पाऊँ” जैसी पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि भक्त को संसार की कोई लालसा नहीं, उसे केवल अपने प्रभु का प्रतिदिन दर्शन चाहिए।

Harshit Jain

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