डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै
डर लागै डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै,
डर लागै डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै,
मैया री मन्ने डर लागै........
सर पे तेरे मुकुट विराजे मुकुट विराजे,
माथे पे बिंदिया लाल तेरे ते डर लागै,
डर लागै डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै,
मैया री मन्ने डर लागै........
कानो में तेरे कुण्डल साजे,
जीभ रही तू कांड तेरे ते डर लागै,
डर लागै डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै,
मैया री मन्ने डर लागै........
हाथ में तेरे खड़क विराजै,
तेरे गल मुंडो की माला तेरे ते डर लागै,
डर लागै डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै,
मैया री मन्ने डर लागै.........
पैरो में तेरे पायल साजै,
चरणों में भोलेनाथ तेरे ते डर लागै,
डर लागै डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै,
मैया री मन्ने डर लागै..........
श्रेणी : दुर्गा भजन
नवरात्रि गीत▹डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै |Kali Mai Ka Bhajan |Kali Mata Bhajan |Navratri Bhajan
यह “डर लागै माँ काली तेरे तै डर लागै” एक लोकभाषा और भक्तिभाव से जुड़ा हुआ माँ काली का भजन है, जिसमें भक्त माँ काली के उग्र और भयंकर स्वरूप का वर्णन करते हुए उनके प्रति भय और श्रद्धा दोनों की भावना व्यक्त करता है। भजन में माता के सिर पर मुकुट, माथे पर लाल बिंदी, कानों में कुंडल, हाथ में खड्ग और गले में मुंडों की माला जैसे उनके पारंपरिक उग्र स्वरूप के प्रतीकों का वर्णन किया गया है। इन सभी रूपों को देखकर भक्त कहता है कि उसे माँ काली के इस भयंकर रूप से डर लगता है।
इस भजन का मुख्य भाव भय, श्रद्धा, शक्ति और माँ काली के रौद्र स्वरूप का दर्शन है। यहाँ भक्त का “डर” केवल सामान्य भय नहीं है, बल्कि माँ की अपार शक्ति और उनके विराट स्वरूप के प्रति विस्मय और श्रद्धा का भाव भी माना जा सकता है। माँ काली का उग्र स्वरूप धार्मिक परंपरा में अधर्म, अहंकार और दुष्ट शक्तियों के विनाश का प्रतीक माना जाता है। इसलिए भजन में दिखाई देने वाला भय वास्तव में माता की असीम शक्ति के सामने मनुष्य की अपनी सीमित शक्ति का अनुभव भी है।
भजन में माँ काली की लाल बिंदी, खड्ग और मुंडमाला जैसे प्रतीकों का उल्लेख मिलता है। ये प्रतीक देवी के रौद्र और संहारकारी रूप को दर्शाते हैं। माँ काली को परंपरागत रूप से ऐसी शक्ति माना जाता है जो बुरी शक्तियों और अधर्म का नाश करती हैं। वहीं अंतिम पंक्ति में माँ काली के चरणों में भोलेनाथ के होने का भाव आता है, जो देवी और भगवान शिव के गहरे आध्यात्मिक संबंध की ओर संकेत करता है। इससे भजन में माँ काली के उग्र रूप के साथ शिव तत्व का भी सुंदर समावेश दिखाई देता है।
भजन की भाषा में हरियाणवी या उत्तर भारतीय लोकभाषा की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। “तेरे तै” और “मैया री मन्ने” जैसे शब्द इसे लोकगीत जैसी सरल और सहज शैली प्रदान करते हैं। इसकी बार-बार दोहराई जाने वाली “डर लागै” पंक्ति भजन को एक विशिष्ट लोकधुन और प्रभावशाली प्रस्तुति देती है। नवरात्रि के अवसर पर माँ काली की आराधना और उनके शक्ति स्वरूप के स्मरण के लिए यह भजन भक्तिमय वातावरण बनाने वाला गीत है।