हम करै छि विनती आहाँ के माँ
हम करै छि विनती आहाँ के माँ,
ये सुधैर दिय हम्मर मती,
माँ सरस्वती माँ सरस्वती....
बाम अंग विणा धारे छी,
कर पुस्तक माला राखे छी,
सोभे सवारी हंस के,
श्रुति ज्ञान विस्व अधी पति,
माँ सरस्वती माँ भगवती....
देव वृन्द सीस नवाबइये,
सब मोन में बास करै छी ये,
करुणा मई भव तारिणी,
दिय ज्ञान हमरो भगवती,
माँ सरस्वती माँ भगवती....
घट घट में आहाँ के बॉस छै,
सृष्टि में आहाँ के राज छै,
सेवक बनल प्यासा सदा,
दूर क दिय माँ कुमति,
माँ सरस्वती माँ भगवती....
श्रेणी : दुर्गा भजन
मैथिलि मे एखन तक के सब स बढ़िया सरस्वती मैया के गीत!हेमकांत झा प्यासा जी के आवाज मे! जरूर सुनी
यह “रहमत कर माँ चरणों में रख ले” एक अत्यंत भावपूर्ण दुर्गा भजन और देवी गीत है, जिसमें एक दुखी और निराश भक्त संसार की परेशानियों से हारकर मां के दरबार में शरण लेने आता है। भजन की शुरुआत ही भक्त की पीड़ा से होती है—वह कहता है कि दुनिया में जगह-जगह ठोकर खाने के बाद अब वह मां के चरणों में आई है और माता से अपने ऊपर कृपा करने तथा उसे अपने चरणों में स्थान देने की प्रार्थना करती है।
इस भजन का मुख्य भाव शरणागति, करुणा, विश्वास और मां के प्रति पूर्ण समर्पण का है। भक्त संसार में अपनेपन की तलाश करता है, लेकिन उसे लगता है कि कोई भी उसके दर्द को समझने वाला नहीं है। इसी अकेलेपन में वह माता को अपना अंतिम सहारा मानता है। “कौन है अपना जग में मईया” जैसी पंक्तियां भक्त के भीतर की भावनात्मक पीड़ा और मां के प्रति उसके गहरे विश्वास को व्यक्त करती हैं।
भजन में भवसागर और अंधेरी राह का प्रतीकात्मक प्रयोग भी किया गया है। संसार को एक ऐसे भवसागर के रूप में दिखाया गया है जिसमें मनुष्य कठिनाइयों के बीच अकेला पड़ सकता है। जब सभी सहारे छूट जाते हैं और रास्ता अंधकारमय दिखाई देता है, तब भक्त माता के दरबार की ओर लौटता है। यहां मां को ऐसी शक्ति के रूप में देखा गया है जिसके चरणों में पहुंचकर भक्त को आश्रय और मानसिक शांति मिल सकती है।
आगे भक्त कहता है कि उसने संसार के सभी बंधनों को छोड़कर अब केवल माता से आस लगाई है। वह मां से धन-दौलत या सांसारिक सुख की बड़ी मांग नहीं करता, बल्कि केवल अपनी अर्जी स्वीकार करने और अपने चरणों में स्थान देने की प्रार्थना करता है। यह भजन की सबसे महत्वपूर्ण भावना है कि सच्ची भक्ति में भक्त भगवान के सामने अपनी इच्छाओं से अधिक अपना मन और अपनी पीड़ा लेकर आता है।
भजन के अंतिम अंतरे में संसार के मतलबी रिश्तों और टूटे हुए विश्वास की पीड़ा सामने आती है। भक्त को लगता है कि जिन्हें अपना समझा, उन्होंने ही उसे पराया कर दिया और उसके सपनों को तोड़ दिया। इसलिए अंततः वह मां को ही अपना सच्चा सहारा मानती है। यह भावना देवी भक्ति में मां के प्रति उस विश्वास को दर्शाती है कि संसार साथ दे या न दे, माता अपने भक्त की पुकार सुनने वाली करुणामयी शक्ति हैं।