तेरी चौखट दे नाल माईये || Teri Choukhat De Naal Maiye

तेरी चौखट दे नाल माईये



( ਏਹ ਮਾਂ ਦੇ ਪਿਆਰ ਦੀ, ਚੌਖਟ ਏ,
ਏਥੇ ਪਿਆਰ ਪੁੱਤਰਾਂ ਦੇ, ਤੋਲ਼ੇ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੇ l
ਏਹ ਤਾ ਹਰ ਗ਼ੁਨਾਹ ਤੇ, ਪਾਉਂਦੀ ਏ ਪਰਦਾ,
ਏਥੇ ਐਬ ਕਿਸੇ ਦੇ, ਫ਼ੋਲੇ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੇ ll )

ਜੋ ਬੰਦ ਪਏ ਸੀ, ਤਕਦੀਰਾਂ ਦੇ, ਤਾਲੇ ਖੋਲ੍ਹ ਲਏ* ll
ਤੇਰੀ ਚੌਖਟ ਦੇ ਨਾਲ ਮਾਈਏ, ਅਸੀਂ ਮੱਥੇ ਜੋੜ ਲਏ ll
ਜੋ ਬੰਦ ਪਏ ਸੀ ਤਕਦੀਰਾਂ ਦੇ.........

ਏਹ ਸਾਰਾ ਜੱਗ ਕਹਿੰਦਾ ਏ, ਤੇਰੇ ਦੀਵਾਨੇ ਹੋ ਗਏ ਹਾਂ l
ਤੇਰੀ ਜੋਤ ਜਗਾਈ ਜਦ ਤੋਂ ਮਾਂ, ਪਰਵਾਨੇ ਹੋ ਗਏ ਹਾਂ ll
ਤੇਰੇ ਨਾਮ ਦੇ ਜੈਕਾਰੇ ਮਾਂ, ਹਰ ਸਾਹ ਵਿੱਚ ਬੋਲ ਲਏ* ll,,
ਤੇਰੀ ਚੌਖਟ ਦੇ ਨਾਲ ਮਾਈਏ, ਅਸੀਂ ਮੱਥੇ ਜੋੜ ਲਏ ll  
ਜੋ ਬੰਦ ਪਏ ਸੀ, ਤਕਦੀਰਾਂ ਦੇ.........

ਅਸੀਂ ਦਰ ਦਰ ਰੁੱਲਦੇ ਸੀ, ਤੂੰ ਗਲ਼ ਨਾਲ ਲਾਇਆ ਮਾਂ l
ਜੇਹਨੂੰ ਸਾਰਾ ਜੱਗ ਠੁਕਰਾਉਂਦਾ ਸੀ, ਓਹਨੂੰ ਤੂੰ ਅਪਣਾਇਆ ਮਾਂ ll
ਤੂੰ ਹੰਝੂ ਵੀ ਸਾਡੇ ਮਾਈਏ, ਮੋਤੀ ਦੇ ਮੋਲ ਲਏ* ll,,
ਤੇਰੀ ਚੌਖਟ ਦੇ ਨਾਲ ਮਾਈਏ, ਅਸੀਂ ਮੱਥੇ ਜੋੜ ਲਏ ll
ਜੋ ਬੰਦ ਪਏ ਸੀ, ਤਕਦੀਰਾਂ ਦੇ.........

ਤੇਰੇ ਮੰਦਿਰ ਦੀਆਂ ਗਲ਼ੀਆਂ, ਬੰਸੀ ਦਾ ਟਿਕਾਣਾ ਏ l
ਤੇਰੀ ਚੌਖਟ ਨਹੀਂ ਛੱਡਣੀ, ਭਾਵੇਂ ਏਹ ਜੱਗ ਛੱਡ ਜਾਣਾ ਏ ll
ਸਾਹਵਾਂ ਦੀ ਪੂੰਜੀ ਨਾਮ ਦੇ, ਮੋਤੀ ਅਨਮੋਲ ਲਏ* ll,,
ਤੇਰੀ ਚੌਖਟ ਦੇ ਨਾਲ ਮਾਈਏ, ਅਸੀਂ ਮੱਥੇ ਜੋੜ ਲਏ ll
ਜੋ ਬੰਦ ਪਏ ਸੀ, ਤਕਦੀਰਾਂ ਦੇ.........



श्रेणी : दुर्गा भजन


यह “हम करै छि विनती आहाँ के माँ” एक भक्तिमय मां सरस्वती वंदना है, जिसे दिए गए विवरण के अनुसार मैथिली भाषा में प्रस्तुत किया गया है। हालांकि इसे आपकी साइट की श्रेणी में “दुर्गा भजन” लिखा गया है, लेकिन गीत के बोल स्पष्ट रूप से मां सरस्वती की आराधना और उनसे ज्ञान तथा सद्बुद्धि प्राप्त करने की प्रार्थना पर केंद्रित हैं। भजन में भक्त मां सरस्वती से अपनी बुद्धि को सुधारने और अज्ञानता तथा कुमति को दूर करने की विनती करता है।

इस भजन का मुख्य भाव ज्ञान, विद्या, सद्बुद्धि, विनम्रता और माता सरस्वती के प्रति पूर्ण श्रद्धा का है। शुरुआत में भक्त मां से प्रार्थना करता है कि वे उसकी मति को सुधार दें। यहां “मति” का अर्थ बुद्धि या विचार-शक्ति से है। भक्त केवल सांसारिक ज्ञान नहीं, बल्कि सही सोच और विवेक की भी कामना करता है। इसलिए यह वंदना विद्यार्थियों, ज्ञान की साधना करने वालों और मां सरस्वती के भक्तों के लिए विशेष भाव रखती है।

भजन में मां सरस्वती के पारंपरिक स्वरूप का भी सुंदर वर्णन मिलता है। वीणा धारण करने वाली, हाथों में पुस्तक और माला रखने वाली तथा हंस की सवारी करने वाली देवी के रूप में उनका स्मरण किया गया है। वीणा संगीत और कला, पुस्तक विद्या तथा माला साधना और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। इन स्वरूपों के माध्यम से भजन मां सरस्वती को ज्ञान, संगीत, कला और विवेक की देवी के रूप में नमन करता है।

आगे भक्त मां को करुणामयी और भवतारिणी कहकर उनसे ज्ञान देने की प्रार्थना करता है। भजन में यह भावना भी है कि मां सरस्वती देवताओं द्वारा भी पूजनीय हैं और उनका वास प्रत्येक मनुष्य के भीतर है। “घट-घट में आहाँ के बास छै” जैसी पंक्ति मां की सर्वव्यापकता की भावना को व्यक्त करती है। भक्त स्वयं को माता का सेवक मानकर उनसे अपने भीतर की कुमति और अज्ञान को दूर करने की विनती करता है।

Harshit Jain

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