माँ मैं तेरा लाडला
ऊँगली पकड़ के ले आई मुझे,
नौरात्रि में बुलाई मुझे,
माँ ओ मेरी माँ, मैं तेरा लाडला,
देखी ऐसी जन्नत ना देखी और कहीं,
तेरी वैष्णो नगरी है दुनिया से हंसी,
रखना मुझे चरणों तले पूजा करूँ तेरी,
तेरे बिना तू ही बता क्या ज़िन्दगी मेरी,
मैं तो तेरे बाँहों की गोद में पला,
माँ ओ मेरी माँ, मैं तेरा लाडला,
हार के जब राह में मैं थक गया था माँ,
आके उसी पल तूने पकड़ा मेरा हाथ,
ऐसी दया किस भाव पे मैया जो तूने किया,
ऐसी ख़ुशी दे दी मुझे अपना बना लिया,
तू नहीं तो दुनिया में कुछ नहीं मेरा,
माँ ओ मेरी माँ, मैं तेरा लाडला,
कैसे करूँ शुक्रिया ये तो बता,
किस जनम का मैया उपकार ये किया,
दुनिया मेरी बदलने लगी जो साथ तू मेरे,
साथी कोई तुमसे नहीं संजीव ये कहे,
प्रेम ये तुम्हारा हो कभी ना कम,
माँ ओ मेरी माँ, मैं तेरा लाडला
श्रेणी : दुर्गा भजन
माँ मैं तेरा लाडला | Navratri 2022 Song | Maa Mai Tera Ladla | Matarani Bhajan by Sanjeev Sharma
यह “माँ मैं तेरा लाडला” एक अत्यंत भावुक और भक्तिभाव से ओतप्रोत माँ वैष्णो देवी (दुर्गा माता) का भजन है, जिसमें भक्त स्वयं को माता का लाडला पुत्र मानते हुए उनके प्रति अपना प्रेम, विश्वास और कृतज्ञता व्यक्त करता है। भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि माता ने स्वयं उसकी उँगली पकड़कर उसे अपने दरबार बुलाया है। यह भाव दर्शाता है कि माता का दरबार केवल उसी भक्त को प्राप्त होता है, जिस पर उनकी विशेष कृपा होती है।
इस भजन का मुख्य भाव माँ की ममता, शरणागति, कृतज्ञता और अटूट विश्वास है। भक्त माता के धाम, विशेष रूप से वैष्णो देवी की पवित्र नगरी की महिमा का वर्णन करते हुए कहता है कि संसार में उससे सुंदर स्थान कोई नहीं। वह माता के चरणों में सदैव रहने और जीवनभर उनकी पूजा करने की कामना करता है। उसके लिए माता का सान्निध्य ही सबसे बड़ा सुख है और उनके बिना जीवन अधूरा प्रतीत होता है। यह भाव माँ और भक्त के बीच के गहरे आध्यात्मिक तथा वात्सल्यपूर्ण संबंध को दर्शाता है।
भजन में माता की करुणा और संरक्षण का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। भक्त स्वीकार करता है कि जब जीवन की राह में वह निराश होकर हार मानने लगा था, तब माता ने उसका हाथ थामकर उसे संभाला। यह संदेश देता है कि सच्चे मन से माता का स्मरण करने वाला भक्त कभी अकेला नहीं होता। माँ अपने बच्चों के दुःख, संघर्ष और पीड़ा को समझकर उन्हें सही मार्ग दिखाती हैं तथा कठिन समय में उनका सहारा बनती हैं।
अंतिम भाग में भक्त माता के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है। वह कहता है कि माता की कृपा से उसका पूरा जीवन बदल गया है और अब वह समझ नहीं पा रहा कि इस उपकार का धन्यवाद किस प्रकार करे। “संजीव” नाम के माध्यम से रचनाकार अपने व्यक्तिगत भावों को व्यक्त करते हुए कहता है कि संसार में माता से बढ़कर कोई सच्चा साथी नहीं है। अंत में भक्त यही प्रार्थना करता है कि माता का प्रेम और आशीर्वाद उस पर सदैव बना रहे। यह भजन प्रत्येक श्रद्धालु को यह संदेश देता है कि माता की कृपा, प्रेम और संरक्षण ही जीवन का सबसे बड़ा संबल है।