ममता मई ममता का खज़ाना
अपने बच्चों से मिलने को मैया धरती पे देखो आती है,
ममता मई ममता का खज़ाना आकर यहाँ पे लुटाती है,
आते ही नवरात्रे बच्चों से मिलने को होती बेकरार माँ,
इस दिन का बेसब्री से करती रहती है इंतज़ार माँ,
करके आई मैया सफर लेने बच्चों की खबर,
छोड़ ऊँचे पर्वतों को माँ........
आकर धरा पर माँ और बेटी के रिश्ते को मैया निभाती है,
अपने बच्चों से मिलने को मैया धरती पे देखो आती है,
( जयकारा शेरावाली दा....
बोलो सांचे दरबार की जय )
ओढ़ लाल रंग माँ चुनार करके आई शेर की सवारी,
सज धज के शेरावाली माँ आज लग रही है बड़ी प्यारी,
भैरो बाबा और बजरंग मैया जी के आये संग,
रखवाली करते मैया की..........
अपने बच्चों के संग बैठ कर माँ दरबार अपना लगाती है,
अपने बच्चों से मिलने को मैया धरती पे देखो आती है,
नौ दिन का त्यौहार माँ मिलके सबके साथ है मनाती,
लेकर बिदाई बच्चों से दसवीं को ये चली जाती,
आंसुओं की बहती धारे रोते सभी माँ के प्यारे,
कुंदन माँ की जुदाई माँ,
मैं फिर आउंगी मिलने को तुमसे बच्चों को माँ समझाती है,
अपने बच्चों से मिलने को मैया धरती पे देखो आती है,
श्रेणी : दुर्गा भजन
ममता का खज़ाना | Mamta Ka Khazana | Navratri Special Maa Sherawali Beautiful Bhajan |Sumitra Banerjee
यह “ममता मई ममता का खज़ाना” एक भावपूर्ण दुर्गा भजन और नवरात्रि विशेष माता रानी का भजन है, जिसमें मां शेरावाली को अपने बच्चों से मिलने वाली ममतामयी मां के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भजन की मूल भावना यह है कि नवरात्रि के अवसर पर माता अपने भक्तों से मिलने के लिए धरती पर आती हैं और अपने बच्चों पर प्रेम, स्नेह और आशीर्वाद लुटाती हैं। यहां माता और भक्त का संबंध केवल देवी और उपासक का नहीं, बल्कि मां और उसके बच्चों जैसा आत्मीय संबंध बन जाता है।
इस भजन का मुख्य भाव वात्सल्य, ममता, प्रेम, मिलन और विरह का है। नवरात्रि आते ही माता अपने बच्चों से मिलने के लिए व्याकुल होती हैं और जैसे कोई मां अपने परिवार की कुशल-क्षेम जानने के लिए घर आती है, वैसे ही शेरावाली माता भक्तों की खबर लेने धरती पर आने की कल्पना की गई है। “मां और बेटी के रिश्ते” का उल्लेख इस भजन को विशेष रूप से भावुक बनाता है और भक्त को माता के साथ अपने व्यक्तिगत एवं आत्मीय संबंध का अनुभव कराता है।
भजन में मां शेरावाली के दिव्य स्वरूप का भी सुंदर वर्णन है। माता लाल रंग की चुनरी ओढ़कर सिंह की सवारी करते हुए आती हैं और उनके साथ भैरव बाबा तथा बजरंगबली के होने की भक्तिपूर्ण कल्पना की गई है। माता के दरबार में भक्तों का एकत्र होना, जयकारे लगाना और मां के साथ बैठकर नवरात्रि का उत्सव मनाना भजन के धार्मिक वातावरण को और जीवंत बनाता है। “सच्चे दरबार की जय” और “शेरावाली दा जयकारा” जैसे उद्घोष सामूहिक भक्ति और माता के प्रति श्रद्धा को दर्शाते हैं।
भजन का अंतिम भाग सबसे अधिक करुण और भावुक है। नौ दिनों तक माता अपने बच्चों के साथ नवरात्रि का उत्सव मनाती हैं और दसवीं तिथि पर विदा होती हैं। माता की विदाई के समय भक्तों की आंखों से आंसू बहते हैं और सभी मां की जुदाई महसूस करते हैं। इसके बावजूद माता अपने बच्चों को सांत्वना देती हैं कि वह फिर उनसे मिलने आएंगी। यह भाव भारतीय देवी-भक्ति में मिलने वाले मिलन और विरह के चक्र को दर्शाता है—माता आती हैं, भक्तों के साथ रहती हैं और फिर अगले नवरात्रि में दोबारा आने का आश्वासन देकर विदा होती हैं।