मेरे मन में बांके बिहारी
मुझे ना स्वर्ग की चिंता,
ना बैकुंठ जाना है,
मुझे ब्रज धाम में रहकर,
श्री राधा नाम गाना है,
मेरे मन में बांके बिहारी ऐसी लगी लगन,
मेरे मन में बांके बिहारी ऐसी लगी लगन,
वास करु मैं वृंदावन में,
छोड़कर जब बंधन,
मेरे मन में बांके बिहारी,
मेरे मन में बांके बिहारी,
साधन दीन हिन हूँ प्यारे,
पापी पापित बड़ा हु,
साधन दीन हिन हूँ प्यारे,
पापी पापित बड़ा हु,
तोड़ के दुनिया के सब रिश्ते,
तेरी शरण पड़ा हूँ प्यारे,
ऐसी कृपा करो अब माधव,
ऐसी कृपा करो अब माधव,
गाऊँ राधा-रमण,
मेरे मन में बांके बिहारी,
मेरे मन में बांके बिहारी,
बची हुई सांसो पर माधव,
तेरा नाम लिखूंगा,
बची हुई सांसो पर माधव,
तेरा नाम लिखूंगा,
कृष्ण नाम रस रस रचना से मैं,
आठो याम चकुंगा,
तेरा नाम है कुंज बिहारी,
है अनमोल रतन,
मेरे मन में बांके बिहारी,
मेरे मन में बांके बिहारी,
चंदन है इस ब्रिज की माटी,
तन पर लिपटा लूंगा,
चंदन है इस ब्रज की माटी,
तन पर लिपटा लूंगा,
ब्रज में रहकर ही भजन करूंगा,
ब्रज में ही मर जाऊंगा प्यारे,
मधुर श्याम सब नेंउना बिसरे,
मधुर श्याम सब नेंउना बिसरे,
प्यारो वृंदावन,
मेरे मन में बांके बिहारी,
मेरे मन में बांके बिहारी,
ऐसी लगी लगन,
वास करु मैं वृंदावन में,
छोड़कर जब बंधन,
मेरे मन में बांके बिहारी,
मेरे मन में बांके बिहारी,
श्रेणी : कृष्ण भजन
Mere Man Me Banke Bihari ! मेरे मन में बांके बिहारी ! Banke Bihari Bhajan 2022
यह “मेरे मन में बांके बिहारी” एक अत्यंत भावपूर्ण कृष्ण भजन है, जिसमें भक्त भगवान श्रीकृष्ण के बांके बिहारी स्वरूप और श्री राधा के प्रति अपनी गहरी भक्ति और प्रेम को व्यक्त करता है। भजन की शुरुआत में भक्त कहता है कि उसे न तो स्वर्ग की इच्छा है और न ही बैकुंठ जाने की लालसा, बल्कि उसकी सबसे बड़ी कामना ब्रज धाम में रहकर श्री राधा नाम का स्मरण और कीर्तन करना है। इससे भजन का मूल भाव स्पष्ट होता है कि भक्त के लिए सांसारिक सुख या मोक्ष से भी अधिक महत्वपूर्ण भगवान कृष्ण और राधा रानी की भक्ति है।
इस भजन का मुख्य भाव अनन्य प्रेम भक्ति, वैराग्य, शरणागति और ब्रज धाम के प्रति अटूट प्रेम है। “मेरे मन में बांके बिहारी ऐसी लगी लगन” की पंक्ति में भक्त की वह अवस्था दिखाई देती है, जिसमें उसका मन पूरी तरह श्री बांके बिहारी की भक्ति में रम गया है। वह संसार के सभी बंधनों को छोड़कर वृंदावन में निवास करना चाहता है और अपना जीवन राधा-कृष्ण के नाम को समर्पित करना चाहता है। भक्त स्वयं को दीन-हीन और पापों से भरा हुआ मानकर भी भगवान की शरण में आने की बात कहता है। यह भाव विनम्रता और पूर्ण आत्मसमर्पण को दर्शाता है।
भजन में भक्त भगवान माधव से कृपा की प्रार्थना करता है कि उसके जीवन की बची हुई प्रत्येक सांस श्रीकृष्ण के नाम को समर्पित हो जाए। “बची हुई सांसों पर माधव, तेरा नाम लिखूंगा” जैसी पंक्ति में भक्त की गहरी इच्छा व्यक्त होती है कि जीवन के अंतिम क्षण तक उसके मुख और हृदय में भगवान का नाम बना रहे। कृष्ण नाम रस में डूबे रहने की कामना यह बताती है कि भक्त के लिए भगवान का नाम ही सबसे बड़ा आनंद और आध्यात्मिक आधार है। यहां भक्ति को किसी सांसारिक इच्छा की पूर्ति का साधन नहीं, बल्कि स्वयं जीवन का उद्देश्य माना गया है।
इस भजन में वृंदावन और ब्रज की पवित्र भूमि के प्रति भी गहरी श्रद्धा दिखाई देती है। भक्त कहता है कि ब्रज की मिट्टी उसके लिए चंदन के समान पवित्र है और वह उसे अपने शरीर पर लगाना चाहता है। वह ब्रज में रहकर ही भजन करना और वहीं अपना अंतिम समय बिताना चाहता है। यह भाव ब्रज भूमि की आध्यात्मिक महिमा और राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़े प्रेम को दर्शाता है। भक्त के लिए वृंदावन केवल एक स्थान नहीं, बल्कि वह पवित्र धाम है जहां उसका मन श्री बांके बिहारी और राधा रानी के चरणों में सदा के लिए रम जाना चाहता है।