नखसिख छविधर की
नखसिख छविधर की।
आरती करिये सियावर की॥
लालपीत अम्बर अति साजे।
मुख निरखत पूरण शशि लाजे।
चंदन खोर भाल पर राजे।
कुमकुम केसर की॥
शीश मुकुट कुंडल झलकत है।
चन्द्रहार मोती लटकत है।
कर कंकण की छवि दरसत है।
जगमग दिनकर की ॥
मृदु चरनन में अधिक ललाई,
हास विलास ना कछु कही जाई
चितवन की गति अति सुखदाई,
मनकू मनहर की ॥
सिहासन पर चवर दुलत है,
वाद्य बजत जय जय उच्चरत है
स्तुति सादर भक्त करत है,
सेंदूर रघुवर की ॥
भक्त हेतु अवतार लियो है,
दुष्टन को संघार कियो है
हरि दासन्ह आनंद कियो है,
पदचर अनुचर की
आरती करिये रघुवर की..
श्रेणी : राम भजन
यह “नखसिख छविधर की” एक पारंपरिक श्रीराम आरती एवं राम भजन है, जिसमें भगवान श्री राम के दिव्य स्वरूप, उनके राजसी वैभव और भक्तों पर उनकी कृपा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है। भजन में भगवान श्रीराम को “सियावर” अर्थात माता सीता के साथ विराजमान रूप में स्मरण किया गया है। “नखसिख” का अर्थ है सिर से लेकर चरणों तक, इसलिए इस आरती में प्रभु श्रीराम के संपूर्ण दिव्य स्वरूप का क्रमबद्ध और भावपूर्ण वर्णन किया गया है। भक्त उनके सुंदर वस्त्र, मुकुट, कुंडल, चंदन तिलक, आभूषण और लालिमा युक्त चरणों का ध्यान करते हुए श्रद्धापूर्वक उनकी आरती उतारता है।
इस भजन का मुख्य भाव भक्ति, आराधना, सौंदर्य-उपासना और पूर्ण समर्पण है। आरती में भगवान श्रीराम के मुखमंडल की तुलना पूर्णिमा के चंद्रमा से की गई है, जिसके सामने चंद्रमा भी लज्जित हो जाए। उनके मस्तक पर सुशोभित चंदन, केसर और कुमकुम का तिलक तथा सिर पर मुकुट, कानों में कुंडल और गले में मोतियों का हार उनके दिव्य और राजसी स्वरूप की झलक प्रस्तुत करते हैं। भक्त इन सभी अलंकारों में केवल बाहरी सौंदर्य ही नहीं, बल्कि भगवान की दिव्यता और मर्यादा का दर्शन करता है।
भजन में आगे भगवान श्रीराम के कोमल चरणों, मधुर मुस्कान और करुणामयी दृष्टि का वर्णन मिलता है। उनकी चितवन को मन को आनंद और शांति देने वाली बताया गया है। सिंहासन पर विराजमान प्रभु के ऊपर चँवर डुलाया जा रहा है, वाद्य यंत्र बज रहे हैं और भक्त जय-जयकार करते हुए उनकी स्तुति कर रहे हैं। यह दृश्य भगवान श्रीराम के राजाधिराज स्वरूप और उनके दिव्य दरबार की कल्पना प्रस्तुत करता है, जहाँ भक्त प्रेम और श्रद्धा से उनकी आरती करते हैं।
अंतिम अंतरे में भगवान श्रीराम के अवतार का उद्देश्य बताया गया है। भजन में कहा गया है कि उन्होंने भक्तों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया। उन्होंने अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की तथा अपने भक्तों को आनंद और सुरक्षा प्रदान की। इस प्रकार यह आरती केवल भगवान के सौंदर्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि उनके धर्म, करुणा, मर्यादा और भक्तवत्सल स्वरूप का भी गुणगान करती है। इसका संदेश है कि जो भक्त श्रद्धा और प्रेम से श्रीराम की आराधना करता है, उसे उनके आशीर्वाद, शांति और आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है।