अरे मन किस पे फूला है बता दे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,अरे मन किस पे फूला है
बतादे कौन तेरा है,बतादे कौन तेरा है
बतादे कौन तेरा है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,अरे मन किस पे फूला है
ये तेरे कोठी बंगला है,ये तेरे महल दुमहला है
ये तेरे कोठी बंगला है,ये तेरे महल दुमहला है
छोड़ इन सबको जाना है,बतादे कौन तेरा है
छोड़ इन सबको जाना है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,अरे मन किस पे फूला है
ये तेरे बेटा नाती है,ये तेरा कुटुंब कबीला है
ये तेरे बेटा नाती है,ये तेरा कुटुंब कबीला है
छोड़ इन सबको जाना है,बतादे कौन तेरा है
[कोरस दोहराता है]
छोड़ इन सबको जाना है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,अरे मन किस पे फूला है
ये तेरी सुंदर क्या है,ये तेरी सुंदर माया है
ये तेरी सुंदर क्या है,ये तेरी सुंदर माया है
एक दिन जल के राख होगी,बतादे कौन तेरा है
एक दिन जल के राख होगी,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,बतादे कौन तेरा है
अरे मन किस पे फूला है,अरे मन किस पे फूला है
श्रेणी : कृष्ण भजन
अरे मन किस पे फूला है बता दे कौन तेरा है | Satsangi Bhajan | Krishna Bhajan | WIth Lyrics
यह भजन मनुष्य को संसार की नश्वरता और मोह-माया की सच्चाई का बोध कराने वाला एक गहरा आध्यात्मिक भजन है। यद्यपि इसे कृष्ण भजन की श्रेणी में गाया जाता है, लेकिन इसका संदेश व्यापक वैराग्य और आत्मचिंतन से जुड़ा है। इसमें अप्रत्यक्ष रूप से भगवान श्री कृष्ण की भक्ति की ओर प्रेरित किया गया है, क्योंकि अंततः केवल ईश्वर ही सच्चा सहारा माने गए हैं।
इस भजन के रचयिता के बारे में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह लोक-भक्ति और सत्संग परंपरा में गाया जाने वाला प्रसिद्ध “सत्संगी भजन” है, जो उत्तर भारत में संत-महात्माओं और भजन मंडलियों द्वारा अक्सर गाया जाता है।
भजन का मुख्य भाव “वैराग्य” और “मोह-माया से जागृति” है। इसमें मन को संबोधित करके पूछा गया है—“अरे मन किस पे फूला है, बता दे कौन तेरा है?” अर्थात इंसान जिस धन, संपत्ति, परिवार और सुंदरता पर घमंड करता है, वह सब अस्थायी है। “कोठी बंगला”, “बेटा नाती”, “कुटुंब कबीला” और “सुंदर माया” जैसी चीज़ों का उल्लेख करके यह समझाया गया है कि मृत्यु के समय इनमें से कोई भी साथ नहीं जाएगा।
“एक दिन जल के राख होगी” पंक्ति शरीर की नश्वरता का गहरा स्मरण कराती है। यह संत परंपरा की उस शिक्षा को दर्शाती है कि मनुष्य को अहंकार छोड़कर भगवान का स्मरण करना चाहिए, क्योंकि संसार की हर वस्तु नाशवान है।
कुल मिलाकर, यह भजन आत्मज्ञान, वैराग्य और ईश्वर-भक्ति का संदेश देता है। इसका उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन की सच्चाई समझाकर उसे भक्ति और सत्संग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना है।