तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी है नजरिया
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
मथुरा तेरो टेढो, वृन्दावन तेरो टेढो,
मथुरा तेरो टेढो, वृन्दावन तेरो टेढो,
टेढ़ी है तेरी गोकुल नगरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
राधा तेरी टेढ़ी, बलदाऊ तेरो टेढो,
राधा तेरी टेढ़ी, बलदाऊ तेरो टेढो,
टेढ़ी रे तेरी यशोदा मैया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
मुकुट तेरो टेढो, लकुट तेरी टेढ़ी,
मुकुट तेरो टेढो, लकुट तेरी टेढ़ी,
टेढ़ी रे श्याम तेरे मुख की मुरलिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
गोपी सब टेढी, ग्वाल सब टेढ़े,
गोपी सब टेढी, ग्वाल सब टेढ़े,
टेढ़ी रे तेरे प्रेम की डगरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
रूप के रसिया से रूप छिपाओ,
माखन माँगूँ तो आंखें दिखाओ,
घी निकले ना बिन टेढी रे उंगरिया,
सीधे का ना गुज़रा रे गुजारिया,
तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया,
मैं सीधी मेरी सीधी रे डगरिया,
श्रेणी : कृष्ण भजन
कृष्णा भजन - तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी है नजरिया | Tu Tedha Teri Tedhi Hai Najariya | Krishna Bhajan
यह भजन भगवान श्री कृष्ण के नटखट, चंचल और लीलामय स्वरूप का अत्यंत मनोरंजक वर्णन करता है। “तू टेढ़ा तेरी टेढ़ी रे नजरिया” एक लोक-रस से भरा कृष्ण भजन है, जिसमें भक्त प्रेमपूर्वक कृष्ण की हर बात को “टेढ़ा” कहकर उनके अनोखे स्वभाव की प्रशंसा करता है। यहाँ “टेढ़ा” शब्द किसी दोष के लिए नहीं, बल्कि कृष्ण की मोहक लीला, चतुराई और प्रेमपूर्ण शरारतों का प्रतीक है।
इस भजन का रचयिता निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है, इसलिए इसे ब्रज लोकभक्ति परंपरा का हिस्सा माना जाता है। इसकी भाषा में ब्रजभाषा और ग्रामीण लोकशैली की मिठास साफ दिखाई देती है, जो इसे रासलीला और झूलों जैसे उत्सवों में लोकप्रिय बनाती है।
भजन का मुख्य भाव “माधुर्य रस और हास्य-प्रेम” है। इसमें भक्त कहता है कि कृष्ण की नजर, उनकी नगरी मथुरा, वृंदावन, उनकी मुरली, मुकुट, यहाँ तक कि उनका पूरा प्रेम मार्ग ही “टेढ़ा” है। इसका भाव यह है कि कृष्ण का प्रेम साधारण नहीं, बल्कि रहस्यमय और मन को उलझा देने वाला है।
“घी निकले ना बिन टेढ़ी रे उंगरिया” पंक्ति बहुत गहरा प्रतीकात्मक अर्थ रखती है। जैसे घी निकालने के लिए उंगली को थोड़ा मोड़ना पड़ता है, वैसे ही भगवान को पाने के लिए केवल सीधापन नहीं, बल्कि प्रेम, विनम्रता और लीलामयी भाव को समझना भी जरूरी है।
भजन में राधा, बलराम और यशोदा का उल्लेख करके पूरे ब्रज वातावरण को जीवंत बना दिया गया है।
कुल मिलाकर, यह भजन कृष्ण की रसमयी लीलाओं, उनके अनोखे प्रेम और भक्तों के साथ उनके चुलबुले रिश्ते को हास्य और माधुर्य के साथ प्रस्तुत करता है।