लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया
जय माता दी जय माता दी,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
ओ देखो लेहेर लेहेर लहराई रे,
लहराई रे.....
देखो शेर पे सवार होके आयी रे,
आयी रे,
बड़ी ममतामयी है महामाई रे महामाई रे महामाई रे,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
जय माता दी जय माता दी....
शंख बजने लगा भाव जगने लगा घी के दिए जला होगा तेरा भला,
जय माता दी बोल जय माता दी,
शंख बजने लगा भाव जगने लगा घी के दिए जला होगा तेरा भला,
देखो शेर पे सवार होके आयी रे,
देखो शेर पे सवार होके आयी रे,
बड़ी ममतामयी है महामाई रे महामाई रे महामाई रे,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
जय माता दी जय माता दी.....
पास आ भी तो जा दूर क्यों है खड़ा शीश दर पे झुका होगा तेरा भला,
जय माता दी बोल जय माता दी,
पास आ भी तो जा दूर क्यों है खड़ा शीश दर पे झुका होगा तेरा भला,
देखो असुर संघार करके आयी रे,
देखो असुर संघार करके आयी रे,
बड़ी ममतामयी है महामाई रे महामाई रे महामाई रे,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया,
लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया.....
श्रेणी : दुर्गा भजन
Navratri Special, लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया, Lehar Lehar Lehrayi Re Meri Maa Ki Chunariya
“लहर लहर लहराई रे मेरी माँ की चुनरिया” एक उत्साहपूर्ण दुर्गा भजन है, जिसमें मां दुर्गा के भव्य स्वरूप, ममता और शक्ति का गुणगान किया गया है। भजन की मुख्य पंक्ति “लहर लहर लहराई रे मेरी मां की चुनरिया” माता के श्रृंगार और उनके दिव्य आगमन की सुंदर कल्पना प्रस्तुत करती है। बार-बार “जय माता दी” का जयकारा भजन में भक्तिमय और उत्सवपूर्ण वातावरण बना देता है।
भजन में माता को शेर पर सवार होकर आने वाली महामाई के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके स्वरूप में एक ओर शक्ति और पराक्रम है, वहीं दूसरी ओर उन्हें “ममतामयी” कहा गया है। यह विरोधाभास देवी के उस स्वरूप को दर्शाता है जिसमें वे भक्तों के लिए करुणामयी मां हैं, लेकिन अधर्म और असुर शक्तियों के विरुद्ध प्रचंड शक्ति का रूप धारण करती हैं।
अगले अंतरे में शंख, भाव-जागरण और घी के दीपक का सुंदर उल्लेख मिलता है। “शंख बजने लगा, भाव जगने लगा” से माता की आराधना के समय उत्पन्न होने वाले आध्यात्मिक वातावरण का चित्र सामने आता है। घी का दीपक जलाना श्रद्धा और पूजा का प्रतीक बनकर आता है। इसके साथ “जय माता दी” का उच्चारण भक्तों को माता के नाम का स्मरण करने और उनकी भक्ति में शामिल होने का संदेश देता है।
भजन में भक्तों को माता के दरबार के निकट आने और शीश झुकाने के लिए भी प्रेरित किया गया है। “पास आ भी तो जा, दूर क्यों है खड़ा” जैसी पंक्ति में माता अपने भक्त को अपने करीब आने के लिए बुलाती हुई प्रतीत होती हैं। “शीश दर पे झुका होगा तेरा भला” के माध्यम से माता के चरणों में विनम्रता और समर्पण को महत्व दिया गया है। यहां सिर झुकाना केवल पूजा की क्रिया नहीं, बल्कि अहंकार छोड़कर माता की शरण में आने का भाव भी प्रस्तुत करता है।
इसके बाद माता के असुर संहार करने वाले शक्तिशाली स्वरूप का वर्णन मिलता है। यह देवी के उस पारंपरिक रूप से जुड़ा है जिसमें वे अधर्म और नकारात्मक शक्तियों का नाश करके धर्म और भक्तों की रक्षा करती हैं। इसी के साथ “बड़ी ममतामयी है महामाई” दोहराकर यह स्पष्ट किया जाता है कि माता का प्रचंड रूप भी अपने भक्तों के लिए करुणा और मातृ-स्नेह से भरा हुआ है।