शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी
शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी,
ज्योतावाली के रंग रंग जाऊंगी.....
मुझे मैया के चरणों की धूली मिले,
मैं तो रोली समझ के लगा आऊंगी,
शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी,
ज्योतावाली के रंग रंग जाऊंगी.....
मेरी मैया के मांग का सिंदूर मिले,
मैं तो सदा सुहागन कहलाऊंगी,
शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी,
ज्योतावाली के रंग रंग जाऊंगी.....
मेरी मैया मुझे आती-जाती मिले,
मैं तो बैया पकड़ के लिवा लाऊंगी,
शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी,
ज्योतावाली के रंग रंग जाऊंगी.....
लोग कहते हैं पगली कहां तू चली,
जहां मैया है मेरी वहां मै चली,
शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी,
ज्योतावाली के रंग रंग जाऊंगी.....
मैं तो दुनिया की मैया सताई हुई,
जो सहारा ना दोगी कहां जाऊंगी,
शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी,
ज्योतावाली के रंग रंग जाऊंगी.....
श्रेणी : दुर्गा भजन
“शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी” एक भावपूर्ण दुर्गा भजन है, जिसमें भक्त मां शेरावाली और ज्योतावाली के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और पूर्ण समर्पण की भावना व्यक्त करता है। भजन का मुख्य भाव यह है कि भक्त संसार की परेशानियों और दुखों से ऊपर उठकर पूरी तरह मां की भक्ति के रंग में रंग जाना चाहता है। “शेरावाली के रंग में रंग जाऊंगी” की पंक्ति इसी आध्यात्मिक समर्पण और माता के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक है।
इस भजन में मां के चरणों की धूल को भी अत्यंत पवित्र माना गया है। भक्त कहता है कि यदि उसे माता के चरणों की धूल मिल जाए तो वह उसे रोली समझकर अपने मस्तक पर लगा लेगा। यह भाव माता के चरणों के प्रति श्रद्धा और विनम्रता को दर्शाता है। यहां चरणों की धूल केवल मिट्टी नहीं, बल्कि माता के आशीर्वाद और कृपा का प्रतीक बन जाती है।
अगले अंतरे में माता की मांग के सिंदूर का उल्लेख आता है। भक्त की इच्छा है कि उसे मां के मांग का सिंदूर प्राप्त हो और वह हमेशा सुहागन कहलाए। यह भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में सिंदूर के शुभ एवं मंगलकारी भाव से जुड़ा हुआ है। भजन में माता को केवल पूजनीय देवी के रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन की रक्षा और मंगल की कामना पूरी करने वाली मां के रूप में देखा गया है।
भजन का एक बहुत आत्मीय भाव उस अंतरे में दिखाई देता है जहां भक्त कहता है कि यदि मां उसे आती-जाती मिल जाएं तो वह उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ ले आएगा। यह पंक्तियां मां और भक्त के बीच मां-बेटे या मां-बेटी जैसे आत्मीय रिश्ते को दर्शाती हैं। भक्त के लिए माता कोई दूर की शक्ति नहीं हैं, बल्कि ऐसी मां हैं जिनके पास वह अपने मन की हर बात कह सकता है और जिन्हें अपने साथ रखना चाहता है।
इसके बाद भक्त कहता है कि लोग उसे पागल कहकर पूछते हैं कि वह कहां जा रही है, लेकिन उसका उत्तर है कि “जहां मैया है मेरी, वहां मैं चली।” यह पंक्ति भक्ति में पूर्ण विश्वास और संसार की परवाह किए बिना अपने आराध्य के मार्ग पर चलने की भावना को दर्शाती है। भक्त के लिए माता का स्थान ही सबसे महत्वपूर्ण है और उनकी शरण में पहुंचना ही जीवन का उद्देश्य बन जाता है।