अब के नवरात मेरे अंगना पधारो
अब के नवरात मेरे,
अंगना पधारो जगदम्बे भवानी,
अंगना पधारो मेरे संकट निवारो,
अंगना पधारो मेरे संकट निवारो,
संकट निवारो मेरी बिगड़ी संवारो,
जगदम्बे भवानी,
अब के नवरात मेरें,
अंगना पधारो जगदम्बे भवानी....
पहली नवरात्रि मेरे,
पाप नाश करना,
दूसरी नवरात्री कष्ट,
संताप हरना,
तीसरी नवरात्री भरम,
मन के मिटाना,
चौथी नवरात्री मेरी,
किस्मत चमकना,
पांचवी नवरात्री दोष,
अवगुण बिसारो,
जगदम्बे भवानी,
अब के नवरात मेरें,
अंगना पधारो जगदम्बे भवानी....
छठी नवरात्री छुटकारा,
हो मोह जाल से,
सातवीं नवरात्री गाऊं,
महिमा सुरताल से,
अष्टमी को आना,
रूप अष्टभुजी धारकर,
नवमी को निष्काम,
भक्ति का देना वर,
तुम हो तारणहार मैया,
मेरी भी तारो,
जगदम्बे भवानी,
अब के नवरात मेरें,
अंगना पधारो जगदम्बे भवानी....
करती हो मैया सबकी,
पूरी मनोकामना,
‘लख्खा’ के दिल में तेरे,
दर्शन की भावना,
टूटे ना मेरे विश्वास,
की ये डोरी,
तरस कान मेरे,
सुनने को लोरी,
अपने सरल को बेटा,
कहके पुकारो,
जगदम्बे भवानी,
अब के नवरात मेरें,
अंगना पधारो जगदम्बे भवानी.....
श्रेणी : दुर्गा भजन
Ab Ke Navraatre Mere Angna Padharo
यह “अब के नवरात मेरे अंगना पधारो” एक भावपूर्ण नवरात्रि और दुर्गा भजन है, जिसमें भक्त माँ जगदम्बे भवानी से नवरात्रि के पावन दिनों में अपने घर और आंगन में पधारने की विनती करता है। भक्त माता से प्रार्थना करता है कि वे उसके जीवन के सभी संकटों को दूर करें, बिगड़े हुए कामों को संवारें और अपने आशीर्वाद से उसके जीवन को सुख-शांति से भर दें। “अंगना पधारो मेरे संकट निवारो” की भावना में भक्त का माता के प्रति गहरा विश्वास और यह श्रद्धा दिखाई देती है कि माँ के आने से उसके जीवन के दुख और परेशानियां दूर हो सकती हैं।
इस भजन का मुख्य भाव माता का स्वागत, शरणागति, संकट निवारण और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना है। भजन में नवरात्रि के नौ दिनों को भक्त के जीवन में होने वाले अलग-अलग आध्यात्मिक परिवर्तनों से जोड़ा गया है। पहले नवरात्रि में पापों के नाश, दूसरे में कष्ट और संताप को दूर करने, तीसरे में मन के भ्रम को मिटाने और चौथे में भाग्य के उज्ज्वल होने की प्रार्थना की गई है। पांचवें नवरात्रि में दोष और अवगुणों को दूर करने तथा आगे के दिनों में मोह-माया से मुक्ति और माता की महिमा गाने की भावना व्यक्त की गई है। इस प्रकार नौ नवरात्रों को आत्मशुद्धि और आत्मिक परिवर्तन की यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भजन के अष्टमी और नवमी वाले हिस्से में माता के अष्टभुजी स्वरूप का स्मरण किया गया है और भक्त उनसे निष्काम भक्ति का वरदान मांगता है। यहां भक्त केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं नहीं चाहता, बल्कि माता से ऐसी भक्ति की कामना करता है जिसमें किसी स्वार्थ का भाव न हो। “तुम हो तारणहार मैया, मेरी भी तारो” में भक्त माता को अपना उद्धार करने वाली शक्ति मानकर उनके चरणों में पूर्ण समर्पण करता है। यह भाव बताता है कि सच्ची भक्ति में भक्त अपने जीवन की दिशा और आध्यात्मिक कल्याण के लिए माता पर भरोसा रखता है।
अंतिम अंतरे में भक्त माता से अपने दर्शन की इच्छा पूरी करने और अपने विश्वास की डोर को कभी न टूटने देने की प्रार्थना करता है। “अपने सरल को बेटा कहके पुकारो” जैसी पंक्ति माता और भक्त के बीच माँ-बेटे के अत्यंत आत्मीय रिश्ते को दर्शाती है। भक्त माता को केवल देवी के रूप में नहीं, बल्कि अपनी स्नेहमयी माँ के रूप में देखता है और चाहता है कि माता उसे अपने बच्चे के समान स्वीकार करें। भजन में “लख्खा” नाम का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः रचनाकार या भजन से जुड़े व्यक्ति का नाम हो सकता है, लेकिन उपलब्ध पाठ के आधार पर इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती।
कुल मिलाकर, “अब के नवरात मेरे अंगना पधारो” एक ऐसा भजन है जिसमें नवरात्रि के नौ दिनों को माता की कृपा, आत्मशुद्धि, संकटों से मुक्ति और निष्काम भक्ति से जोड़ा गया है। भक्त माँ जगदम्बे से अपने घर आकर जीवन के दुखों को दूर करने, बिगड़ी हुई परिस्थितियों को सुधारने और अपने हृदय में अटूट विश्वास बनाए रखने की प्रार्थना करता है। यह भजन नवरात्रि, माता की चौकी और जागरण के भक्तिमय वातावरण के लिए विशेष भाव रखता है। इसके मूल गीतकार या रचनाकार का आधिकारिक नाम दिए गए विवरण से स्पष्ट नहीं है, इसलिए बिना प्रमाण के किसी व्यक्ति को इसका लेखक बताना उचित नहीं होगा।