बैठी हो माँ सामने कर सोलह श्रृंगार
बैठी हो माँ सामने,
कर सोलह श्रृंगार,
तू करुणा की है मूर्ति,
और ममता का भण्डार,
बैठी हो माँ सामने,
कर सोलह श्रृंगार......
निरख रही हो हम भक्तों को,
बड़े प्यार से जग जननी,
इसी तरह हम भक्तों को भी,
तेरी ही सेवा करनी,
तू हर दम देती रहना,
हमको माँ प्यार दुलार,
बैठी हो माँ सामने,
कर सोलह श्रृंगार......
तेरी ममता की छाया में,
इसी तरह हम पले बढ़े,
तेरी कृपा से ही माता,
हम अपने पैरों पे खड़े,
तेरे बच्चों को देने में,
तू करती नहीं इंकार,
बैठी हो माँ सामने,
कर सोलह श्रृंगार......
हम बच्चों पर हरदम मैया,
आशीर्वाद तुम्हारा हो,
हर्ष कहे माँ शेरोवाली,
हरपल साथ तुम्हारा हों,
तू हाथ दया का रखना,
साँचा तेरा दरबार,
बैठी हो माँ सामने,
कर सोलह श्रृंगार......
श्रेणी : दुर्गा भजन
बैठी हो माँ सामने कर सोलह श्रृंगार || Baithi Ho Maa Samne Kar Solah Singar || Upasana Mehta
यह “बैठी हो माँ सामने, कर सोलह श्रृंगार” एक भावपूर्ण दुर्गा भजन है, जिसमें भक्त माँ शेरावाली के सुंदर, ममतामयी और करुणामयी स्वरूप का ध्यान करता है। भजन में माता रानी को अपने सामने सोलह श्रृंगार किए हुए विराजमान देखकर भक्त उनके दिव्य रूप का वर्णन करता है। उन्हें करुणा की मूर्ति और ममता का भंडार कहा गया है। यह भजन माता और उनके भक्तों के बीच एक माँ-बच्चे के अत्यंत आत्मीय संबंध को दर्शाता है, जिसमें भक्त स्वयं को माता की संतान मानकर उनके प्रेम, दुलार और संरक्षण की कामना करता है।
इस भजन का मुख्य भाव माँ के प्रति वात्सल्य, श्रद्धा, प्रेम, कृतज्ञता और पूर्ण समर्पण है। भक्त महसूस करता है कि माता रानी उसे बड़े प्रेम से देख रही हैं और वह भी जीवनभर उनकी सेवा और भक्ति करना चाहता है। “तेरी ममता की छाया में, इसी तरह हम पले बढ़े” जैसी पंक्तियों में भक्त माता को अपने जीवन की पालनहार मानता है। वह स्वीकार करता है कि माता की कृपा से ही उसे जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति मिली और वह अपने पैरों पर खड़ा हो सका। इस भाव में भक्त अपनी हर उपलब्धि और जीवन के सुख को माता की कृपा का परिणाम मानकर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है।
भजन में माता को ऐसी दयालु और उदार माँ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अपने बच्चों को देने में कभी पीछे नहीं हटतीं। भक्त माता से प्रार्थना करता है कि उनके बच्चों पर हमेशा उनका आशीर्वाद बना रहे और उनका दया का हाथ सदैव सिर पर रहे। “साँचा तेरा दरबार” के माध्यम से माता के दरबार को न्याय, सच्चाई और विश्वास का स्थान माना गया है। अंतिम अंतरे में “हर्ष” नाम का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः रचनाकार या संबंधित व्यक्ति का नाम हो सकता है, लेकिन उपलब्ध पाठ के आधार पर इसकी निश्चित पुष्टि नहीं की जा सकती।