जो करते रहोगे भजन धिरे धिरे
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे,
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे......
अगर उनसे मिलने की दिल में तमन्ना,
अगर प्रभु से मिलने की दिल में तमन्ना,
अगर हरी से मिलने की दिल में तमन्ना,
करो शुद्ध अन्तःकरन धीरे धीरे,
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे.........
कोई काम दुनिया में मुश्किल नहीं है,
जो करते रहोगे यतन धीरे धीरे,
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे,
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे......
करो प्रेम से भक्ति सेवा हरी की,
करो प्रेम से भक्ति पूजा हरी की,
तो मिल जायेगा वो रतन धीरे धीरे,
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे,
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे,
जो करते रहोगे भजन धीरे धीरे,
तो मिल जायेगा वो सजन धीरे धीरे.......
श्रेणी : कृष्ण भजन
यह भजन भगवान श्री कृष्ण (हरी/श्याम) की भक्ति में धैर्य, निरंतरता और सच्चे प्रयास का महत्व समझाता है। “जो करते रहोगे भजन धीरे-धीरे” एक पारंपरिक कृष्ण भजन है, जिसके रचयिता के बारे में कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे लोक-भक्ति परंपरा की रचना माना जाता है। यह भजन उत्तर भारत, विशेषकर ब्रज और वैष्णव भक्ति धारा से जुड़ा हुआ है, जहाँ भगवान को प्रेम और समर्पण के माध्यम से पाने का मार्ग बताया जाता है।
इस भजन का मुख्य भाव “धैर्यपूर्ण भक्ति (साधना)” है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति निरंतर भगवान का भजन करता रहे, तो धीरे-धीरे उसे भगवान का साक्षात्कार (मिलन) अवश्य होगा। “शुद्ध अन्तःकरण” पर विशेष जोर दिया गया है, यानी मन को पवित्र, निष्कपट और प्रेम से भरना जरूरी है। भजन यह भी बताता है कि जैसे संसार के किसी भी काम में सफलता के लिए लगातार प्रयास (यत्न) जरूरी है, वैसे ही भगवान को पाने के लिए भी नियमित भक्ति और सेवा आवश्यक है।
“धीरे-धीरे” शब्द इस भजन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—यह दर्शाता है कि आध्यात्मिक प्रगति एकदम से नहीं होती, बल्कि समय, धैर्य और सच्चे प्रेम से ही फल मिलती है। अंत में “रतन” शब्द भगवान की कृपा और दिव्य प्राप्ति का प्रतीक है, जो प्रेम से की गई भक्ति के फलस्वरूप मिलती है।
कुल मिलाकर, यह भजन हमें सिखाता है कि बिना जल्दबाज़ी किए, निरंतर भजन, सच्चे मन और प्रेम के साथ की गई भक्ति ही अंततः भगवान तक पहुंचने का मार्ग बनती है।