मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये, Mainu Makhan Khvade Ni Gopiye

मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये



मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये बंसी दी तान सुनांवा,
मेरा पल्ला छड्ड दे वे मोहना मैं घर अपने नू जांवा....

मिशरी वाला माक्खन तेरा लगदा ही बहुत प्यारा,
हथ्थी देदे तां गल्ल चंगी नहीं ते चुरां लूं सारा,
तद की करेंगी फेर नी बस भरेंगी ठंडिया आहां,
मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये बंसी दी तान सुनांवा.....

सुन ले कान्हां कन्न खोल के ना तू कर चतुराई,
आके सिधेया कर लू तैनू जद सुनेया तेरी माई,
करतूतां दसां तेरियां मैं चुगलियां जाके लांवा,
मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये बंसी दी तान सुनांवा....

जे तूं चांवे खैर नी अपनी चुगलियां जाके लादी,
दूध दही दियां मटकियां सबे मैथो फेर बचा ली,
मैं मार के रोड़े तोड़ा नी तैनू यमुना दे विच बहांवा,
मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये बंसी दी तान सुनांवा....

मैं हारी तूं जितेया कान्हा लै फड़ माक्खन खा लै,
गिले शिकवे मिटा के सारे मिशरी दे विच मिल लै,
मैंनू तान सुना दे मिठी वे मैं कष्टहीन हो जांवा,
मैंनू मक्खन खवादे नी गोपिये बंसी दी तान सुनांवा.....



श्रेणी : कृष्ण भजन


यह भजन भगवान श्री कृष्ण और गोपियों के बीच होने वाली नटखट, प्रेमभरी लीलाओं पर आधारित है। इसमें एक गोपी और कान्हा के बीच संवाद दिखाया गया है, जहाँ कान्हा माखन खाने की जिद करते हैं और बदले में बंसी (बांसुरी) बजाने का वादा करते हैं। गोपी पहले उन्हें रोकती है, उनकी शरारतों की शिकायत करने की बात करती है, लेकिन अंत में प्रेम और भक्ति के आगे हार मानकर उन्हें माखन दे देती है और उनसे मधुर बंसी सुनने की इच्छा जताती है।

इस भजन के लेखक के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती, क्योंकि ऐसे कई पारंपरिक कृष्ण भजन लोक परंपरा से चले आ रहे हैं और समय के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में गाए जाते रहे हैं। यह खासतौर पर उत्तर भारत (जैसे पंजाब, उत्तर प्रदेश, ब्रज क्षेत्र) की लोकभाषा और शैली में रचा गया प्रतीत होता है, जिसमें पंजाबी और ब्रजभाषा का मिश्रण दिखाई देता है।

भजन का मुख्य भाव “माधुर्य भक्ति” है, जिसमें भक्त और भगवान के बीच प्रेम, अपनापन और हंसी-मजाक का रिश्ता दिखाया जाता है। यहाँ भगवान को सर्वशक्तिमान रूप में नहीं, बल्कि एक शरारती बालक और प्रिय सखा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। माखन यहाँ प्रेम और भक्ति का प्रतीक है, जबकि बंसी की धुन आत्मा को आनंद और शांति देने वाली दिव्य अनुभूति को दर्शाती है। इस तरह यह भजन केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के मधुर संबंध की झलक है।

Harshit Jain

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