मैया मनाये ना मानी
मैया मनाये ना मानी,
नरियल खो रिसानी,
मैया मनाये ना मानी,
नरियल खो रिसानी॥
पान सुपारी लौंग लाये,
पर वो थी ज़िद ठानी,
नरियल खो रिसानी,
मैया मनाये ना मानी,
नरियल खो रिसानी॥
चम्पा चमेली की माला लाये,
देख के ना हरषानी,
नरियल खो रिसानी,
मैया मनाये ना मानी,
नरियल खो रिसानी॥
खीर बताशा हलुआ लाये,
खाये ना मात भवानी,
नरियल खो रिसानी,
मैया मनाये ना मानी,
नरियल खो रिसानी॥
"राजेन्द्र" भेंट नारियल लाये,
देख के माँ मुस्कानी,
नरियल खो रिसानी,
मैया मनाये ना मानी,
नरियल खो रिसानी॥
श्रेणी : दुर्गा भजन
मैया मनाये न मानी,नारियल खों रिसानी।--दुर्गा गीत,देवी भजन,भजन चलस,नवरात्रे,भगत, दुर्गा जस,
यह “मैया मनाये ना मानी, नारियल खों रिसानी” एक लोकभक्ति शैली का माँ दुर्गा/देवी भजन है, जिसमें भक्त माता को मनाने का प्रयास करता है, लेकिन माता किसी बात से नाराज़ होकर प्रसन्न नहीं हो रही हैं। भजन की मुख्य पंक्ति “मैया मनाये ना मानी, नारियल खो रिसानी” में माता के रूठने और भक्त के उन्हें प्रेमपूर्वक मनाने का भाव दिखाई देता है। यह भजन देवी और भक्त के बीच के संबंध को एक माँ और संतान के आत्मीय रिश्ते की तरह प्रस्तुत करता है, जिसमें भक्त अपनी माता को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह की भेंट और प्रसाद लेकर आता है।
इस भजन का मुख्य भाव माँ के प्रति प्रेम, भक्ति, मनुहार और माता को प्रसन्न करने की भावना है। भक्त माता के लिए पान, सुपारी और लौंग लेकर आता है, लेकिन माता अपनी जिद पर अड़ी रहती हैं और प्रसन्न नहीं होतीं। इसके बाद भक्त चंपा और चमेली के फूलों की माला अर्पित करता है, फिर भी माता के चेहरे पर प्रसन्नता नहीं आती। इन पंक्तियों में भक्त की मासूमियत और माता के प्रति उसका अपनापन दिखाई देता है। भजन में पूजा की विभिन्न सामग्रियों के माध्यम से देवी को मनाने की लोकपरंपरा को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
आगे भक्त माता के लिए खीर, बताशे और हलुए जैसे प्रसाद लेकर आता है। ये सभी चीजें भारतीय देवी-पूजा और लोकभक्ति परंपरा में प्रेमपूर्वक भोग लगाने की भावना से जुड़ी हैं। लेकिन भजन में माता फिर भी प्रसाद ग्रहण नहीं करतीं और रूठी रहती हैं। इसका भाव यह भी हो सकता है कि भगवान या देवी को केवल बाहरी भेंट और प्रसाद से नहीं, बल्कि सच्चे मन और निष्कपट भावना से प्रसन्न किया जा सकता है। भक्त की सारी कोशिशों के पीछे उसका प्रेम और माता के प्रति समर्पण ही सबसे महत्वपूर्ण है।
अंतिम अंतरे में “राजेन्द्र” नाम का उल्लेख मिलता है, जहां भक्त माता के लिए नारियल भेंट लेकर आता है और इस बार माता को देखकर मुस्कुराने का भाव आता है। इससे भजन में एक सुखद मोड़ आता है—जिस माता को इतने प्रयासों के बाद भी मनाना कठिन था, वह अंततः भक्त की भेंट और प्रेम को स्वीकार करके मुस्कुराती हैं। यहां नारियल देवी को अर्पित की जाने वाली श्रद्धा और समर्पण की भेंट का प्रतीक है। माता का मुस्कुराना उनकी कृपा और भक्त की भक्ति स्वीकार करने का संकेत माना जा सकता है।
कुल मिलाकर, “मैया मनाये ना मानी” एक सरल और मनोरंजक लोकभक्ति शैली का दुर्गा भजन है, जिसमें माता के रूठने और भक्त द्वारा उन्हें मनाने की भावपूर्ण कथा प्रस्तुत की गई है। इसमें पान-सुपारी, लौंग, फूलों की माला, खीर, बताशे, हलुआ और नारियल जैसी पूजा सामग्री के माध्यम से देवी के प्रति प्रेम और श्रद्धा व्यक्त की गई है। भजन का सुंदर भाव यह है कि भक्त अपनी माता को प्रसन्न करने के लिए पूरी श्रद्धा से प्रयास करता है और अंततः माता उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर मुस्कुराती हैं। उपलब्ध पाठ में “राजेन्द्र” नाम आता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह भजन के रचनाकार का नाम है या प्रस्तुति में भक्त का संदर्भ, इसलिए इसके मूल गीतकार या रचनाकार का नाम निश्चित रूप से बताना उचित नहीं होगा।