समर चली महाकाली काला खप्पर
समर चली महाकाली,
समर चलीं महाकाली,
काला खप्पर हाथ धरे माँ,
मुंडन माला डाली,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ॥
एक हाथ में खडग धरे माँ,
दूजे त्रिशूल है धारी,
तीजे में है चक्र सुदर्शन,
चौथे कटार संभाली,
चौथे कटार संभाली,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ॥
आँखों से चिंगारी छोड़े,
मुंह से निकले ज्वाला,
थर थर कांपे देखो असुरदल,
ऐसी ले किलकारी,
समर चलीं महाकाली,
चौथे कटार संभाली,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ।
आँखों से चिंगारी छोड़े,
मुंह से निकले ज्वाला,
थर थर कांपे देखो असुरदल,
ऐसी ले किलकारी,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ॥
पल में कई दानव संहारे,
पल में चट कर डाली,
पल में कई को राख बनाई,
ऐसी ले हुंकारी,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ॥
कालो की माँ काल बनी रे,
रणचंडी माँ ज्वाला,
दे मुझे आँचल की छैया,
मैया मेहरवाली,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ।
समर चली महाकाली,
समर चलीं महाकाली,
काला खप्पर हाथ धरे माँ,
मुंडन माला डाली,
समर चलीं महाकाली,
समर चलीं महाकाली ॥
श्रेणी : दुर्गा भजन
Samar Chali Mahakaali || समर चली महाकाली || Shahnaaz Akhtar || Navratri Special Bhajan
यह “समर चली महाकाली, काला खप्पर” एक शक्तिशाली महाकाली और दुर्गा भजन है, जिसमें मां काली के उग्र, वीर और दुष्टों का संहार करने वाले स्वरूप का वर्णन किया गया है। भजन में महाकाली को युद्ध के लिए प्रस्थान करती हुई देवी के रूप में चित्रित किया गया है। उनके हाथ में काला खप्पर, गले में मुंडमाला और विभिन्न अस्त्र-शस्त्र हैं। यह स्वरूप मां की उस शक्ति का प्रतीक है जो अधर्म और नकारात्मक शक्तियों का विनाश करती है।
इस भजन का मुख्य भाव शक्ति, वीरता, उग्रता और माता की शरण में सुरक्षा पाने का है। एक ओर मां का रूप असुरों के लिए अत्यंत भयंकर बताया गया है, वहीं दूसरी ओर भक्त उन्हें “मेहरवाली मैया” कहकर अपने लिए करुणामयी मां के रूप में पुकारता है। यही विरोधाभास भजन को विशेष बनाता है—माता दुष्टों के लिए काल का रूप हैं, लेकिन अपने भक्तों के लिए मां की तरह सुरक्षा और स्नेह देने वाली हैं।
भजन में महाकाली के चार हाथों और उनके अस्त्रों का भी वर्णन मिलता है। एक हाथ में खड्ग, दूसरे में त्रिशूल, तीसरे में सुदर्शन चक्र और चौथे में कटार का उल्लेख किया गया है। इन अस्त्रों के माध्यम से देवी की असीम शक्ति और अधर्म के विरुद्ध उनके संघर्ष का प्रतीकात्मक चित्रण किया गया है। उनका उग्र स्वरूप, आंखों से निकलती चिंगारी और मुख से प्रकट होती ज्वाला शत्रु शक्तियों के विनाशकारी अंत का संकेत देती हैं।
आगे भजन में असुरों के संहार का वर्णन बहुत प्रभावशाली शैली में किया गया है। मां के रण में उतरते ही असुरदल के कांपने और उनके द्वारा अनेक दानवों का संहार किए जाने की कल्पना की गई है। “रणचंडी” और “ज्वाला” जैसे संबोधन मां के युद्धमय और शक्तिशाली स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करते हैं। यह वर्णन देवी के उस रूप की ओर संकेत करता है जो संसार से अधर्म और दुष्ट शक्तियों को समाप्त करने वाली शक्ति माना जाता है।
भजन का सबसे सुंदर भाव अंत में दिखाई देता है, जब भक्त उसी उग्र महाकाली से “आंचल की छाया” मांगता है। इससे स्पष्ट होता है कि भक्त के लिए मां का भयंकर रूप डर का कारण नहीं, बल्कि सुरक्षा का आश्वासन है। माता शत्रुओं के लिए काल हो सकती हैं, लेकिन अपने बच्चों के लिए उनकी छाया सबसे सुरक्षित स्थान है। इसलिए भजन में शक्ति और वात्सल्य दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।