थोड़ा देती है या ज्यादा देती है
थोड़ा देती है,
या ज्यादा देती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
दादी देती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
मैया देती है ।।
हमारे पास जो कुछ है,
इसी की है मेहरबानी,
हमेशा भेजती रहती,
कभी दाना कभी पानी,
सुख कर देती है,
और दुःख हर लेती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
दादी देती है ।।
हमेशा भूखे उठते है,
कभी भूखे नहीं सोते,
भला तकलीफ कैसे हो,
हमारी मैया के होते,
सुख कर देती है,
और दुःख हर लेती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
दादी देती है ।
दिया जो दादी ने हमको,
कभी कर्जा नहीं समझा,
दयालु मैया ने हमको,
हमेशा अपना ही समझा,
सुख कर देती है,
और दुःख हर लेती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
दादी देती है ।।
हमने ' बनवारी ' माँ से,
बड़े अधिकार से मांगा,
दिया है खुश होकर माँ ने,
जब भी सरकार से मांगा,
सुख कर देती है,
और दुःख हर लेती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
दादी देती है ।।
थोड़ा देती है,
या ज्यादा देती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
दादी देती है,
हमको तो जो कुछ भी देती,
मैया देती है ।।
श्रेणी : दुर्गा भजन
कभी कोई कमी महसूस नहीं होने देगा ये भजन | RaniSati Dadi Bhajan | Dadi Ji Bhajan | Madhuri Madhukar
“थोड़ा देती है या ज्यादा देती है” एक भावपूर्ण देवी भजन है, जिसमें भक्त रानी सती दादी/मैया के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा, विश्वास और कृतज्ञता व्यक्त करता है। भजन की मुख्य पंक्ति यह भाव देती है कि माता भक्त को कितना देती हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि भक्त के लिए मां की ओर से मिलने वाली हर चीज कृपा और आशीर्वाद के समान है। इसलिए भक्त बार-बार कहता है कि उसे जो कुछ भी मिलता है, वह उसकी दादी मैया की ही देन है।
इस भजन का मुख्य भाव कृतज्ञता, मातृ-स्नेह, विश्वास और शरणागति का है। भक्त अपने जीवन में उपलब्ध सुख-सुविधाओं और आवश्यकताओं को माता की मेहरबानी मानता है। “कभी दाना कभी पानी” जैसी पंक्तियों के माध्यम से जीवन की मूल आवश्यकताओं को भी मां की कृपा से जोड़कर देखा गया है। साथ ही माता को ऐसी दयालु शक्ति बताया गया है जो भक्त के सुख को बढ़ाती हैं और उसके दुखों को हर लेती हैं।
अगले अंतरे में भक्त अपनी मां पर अटूट निर्भरता व्यक्त करता है। वह कहता है कि भले ही कभी भूखे उठना पड़े, लेकिन मां की कृपा से भूखे सोने की स्थिति नहीं आती। इसका भाव यह है कि भक्त को विश्वास है कि उसकी दादी मैया उसकी मूल आवश्यकताओं का ध्यान रखती हैं। यह पंक्तियां माता को एक ऐसी करुणामयी मां के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो अपने बच्चों को कठिन परिस्थितियों में भी अकेला नहीं छोड़ती।
भजन में माता की कृपा को कर्ज या लेन-देन की तरह नहीं माना गया है। भक्त कहता है कि दादी ने जो कुछ दिया, उसे कभी कर्ज नहीं समझा, क्योंकि दयालु मां ने उसे हमेशा अपना ही समझा। यह बहुत आत्मीय भाव है—भक्त और माता के रिश्ते में किसी हिसाब-किताब की जगह प्रेम और अपनापन है। इसी कारण माता की ओर से मिलने वाला प्रत्येक आशीर्वाद भक्त को सहज और प्रेमपूर्ण लगता है।
अंतिम अंतरे में “बनवारी” नाम का उल्लेख आता है—“हमने ‘बनवारी’ मां से, बड़े अधिकार से मांगा।” यहां भक्त माता से अपनेपन के अधिकार के साथ मांगने की बात करता है और विश्वास रखता है कि मां प्रसन्न होकर उसकी इच्छा पूरी करती हैं। यह भाव दर्शाता है कि सच्ची भक्ति में भक्त अपनी मां के सामने बिना संकोच अपने मन की बात रख सकता है। वीडियो शीर्षक में “Madhuri Madhukar” का नाम दिया गया है, इसलिए उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह नाम भजन की गायन/प्रस्तुति से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन दिए गए बोलों में गीतकार का नाम स्पष्ट नहीं है।