विसर्जन को चलीं रे चली रे मोरी मैया
विसर्जन को चली रे,
चली रे मोरी मैया,
विदाई से आज मोरी,
विदाई से आज मोरी,
भर आई है अखियां,
विसर्जन को चलीं रे,
चली रे मोरी मैया ॥
नौ दिन माई तेरी सेवा में बीते,
अब कैसे विरहा की ये रैन बीते,
नौ दिन माई तेरी सेवा में बीते,
तुझ बिन लगेगी माई,
सुनी सुनी गलियां,
विसर्जन को चलीं रे,
चली रे मोरी मैया ॥
आज चली रे धाम भवानी,
सुना करके आज भवानी,
आज चली रे धाम भवानी,
जाए सही ना माई,
विरहा की घड़ियाँ,
विसर्जन को चलीं रे,
चली रे मोरी मैया ॥
रो रो कर करते है विदाई,
अगले बरस फिर आना है माई,
रो रो कर करते है विदाई,
तुझसे बिछड़ के मैया,
बन ना जाऊं मैं जोगनिया,
विसर्जन को चलीं रे,
चली रे मोरी मैया ॥
विसर्जन को चली रे,
चली रे मोरी मैया,
विदाई से आज मोरी,
विदाई से आज मोरी,
भर आई है अखियां,
विसर्जन को चलीं रे,
चली रे मोरी मैया ॥
श्रेणी : दुर्गा भजन
विसर्जन को चली मेरी मैया ~ शहनाज़ अख़्तर ~ Shahnaaz Akhtar ~ नवरात्रि का सबसे दर्द भरा विसर्जन भजन
“विसर्जन को चली रे, चली रे मोरी मैया” एक भावुक दुर्गा विसर्जन भजन है, जिसमें नवरात्रि के नौ दिनों के बाद मां दुर्गा की विदाई के समय भक्तों के मन में उठने वाले प्रेम, विरह और भावनात्मक दर्द को व्यक्त किया गया है। भजन में भक्त मां को विदा करते हुए भावुक हो जाता है और उसकी आंखों में आंसू भर आते हैं। यह रचना माता के आगमन से लेकर विसर्जन तक के भक्तिमय संबंध को बहुत आत्मीय रूप में प्रस्तुत करती है।
भजन का मुख्य भाव माता की विदाई, विरह, प्रेम और अगले वर्ष फिर से माता के आगमन की प्रतीक्षा है। “नौ दिन माई तेरी सेवा में बीते” पंक्ति नवरात्रि के दौरान होने वाली पूजा, सेवा और आराधना की ओर संकेत करती है। इन नौ दिनों में भक्त माता के साथ एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है, इसलिए जब विसर्जन का समय आता है तो उसके लिए मां के बिना घर और गलियां सूनी लगने लगती हैं।
“आज चली रे धाम भवानी” में माता भवानी की विदाई का भाव दिखाई देता है। भक्त जानता है कि विसर्जन के बाद माता की प्रतिमा अपने धाम लौटेगी, लेकिन भावनात्मक रूप से उसे यह बिछड़ना स्वीकार करना कठिन लगता है। “जाए सही ना माई, विरहा की घड़ियां” जैसी पंक्तियां मां से दूर होने के दर्द को व्यक्त करती हैं। यहां विरह सांसारिक बिछड़ाव से अधिक भक्त और आराध्य के बीच प्रेमपूर्ण लगाव का प्रतीक है।
भजन का सबसे भावुक हिस्सा वह है जहां भक्त रो-रोकर माता को विदाई देने की बात करता है और साथ ही उनसे अगले वर्ष फिर आने का वचन मांगता है। “अगले बरस फिर आना है माई” में नवरात्रि और दुर्गा पूजा के बाद होने वाली पारंपरिक विदाई की भावना दिखाई देती है। भक्त के लिए माता की विदाई स्थायी बिछड़ाव नहीं है, बल्कि अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की आशा से जुड़ी हुई है।
“तुझसे बिछड़ के मैया, बन ना जाऊं मैं जोगनिया” जैसी पंक्ति माता के प्रति भक्त के अत्यंत गहरे प्रेम और भावनात्मक लगाव को दर्शाती है। यहां भक्त अपनी व्याकुलता को एक काव्यात्मक रूप में व्यक्त करता है कि मां के बिना उसका मन संसार में नहीं लगेगा। इस तरह पूरा भजन मां के प्रति वात्सल्य, श्रद्धा, प्रेम और विरह को केंद्र में रखता है।