ओ कान्हा रे तेरे बिना भी क्या जीना
ओ कान्हा रे, तेरे बिना भी क्या जीना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
फूलों में कलियों में, वृंदावन की गलियों में,
तेरे बिना कुछ कहीं ना, तेरे बिना भी क्या जीना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
जाने कैसे अनजाने ही, आन बसे मेरे मन में,
अपना सब कुछ खो बैठा मैं,जब से बसे मेरे दिल में,
भक्ति के अफसाने, मैं जानू तू जाने, और ये जाने कोई ना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
मेरी धड़कन में बसे हो, सांसों में तेरी खुशबू है,
इस धरती से उस अंबर तक, मेरी नजर में तू ही तू है,
भक्ति ये छूटे ना, तू मुझसे रूठे ना, साथ ये छूटे कभी ना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
तुम बिन सुना मेरा जीवन, तुम बिन सुने दिन ये सारे,
मेरा जीवन तुझको अर्पण, तुम ही हो जीने के सहारे,
तेरे बिना मेरी,मेरे बिना तेरी, ये जिंदगी जिंदगी ना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
तेरे बिना भी क्या जीना,
Lyrics - Jay Prakash Verma, Indore
श्रेणी : कृष्ण भजन
यह कृष्ण भजन श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह और पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना को अत्यंत कोमल और भावुक शब्दों में व्यक्त करता है। इस भजन के गीतकार जय प्रकाश वर्मा, इंदौर हैं। भजन में भक्त यह स्वीकार करता है कि कान्हा के बिना जीवन, सांस, धड़कन और संसार सब सूना है, और उसकी हर दृष्टि, हर अनुभूति में केवल कृष्ण ही बसे हुए हैं। फूलों, कलियों और वृंदावन की गलियों के माध्यम से यह भजन कृष्ण की सर्वव्यापक उपस्थिति का सुंदर चित्र खींचता है। यह रचना प्रेम-भक्ति की उस अवस्था को दर्शाती है जहाँ भगवान के बिना जीवन की कल्पना भी असंभव हो जाती है, और श्रोता के मन में गहरी भावुकता, प्रेम और कृष्णमय चेतना जगा देती है।
Radhe Radhe ! Sir Ji ,
ReplyDeleteThanks for Uploading this Bhajan,
Jay Prakash Verma, Indore,