माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
खूबे सजाइयो भैया खूब ही सजाइयो
खूबे सजाइयो भैया खूब ही सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
सुंदर सा एक सिंह बनाइयो
सुंदर सा एक सिंह बनाइयो
उसपे दुर्गा मैया बिठाइयो
उसपे दुर्गा मैया बिठाइयो
सुंदर आसन बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
सर पे मुकुट गले मोती माला
सर पे मुकुट गले मोती माला
चक्र गदा त्रिशूल खड़ग निराला
चक्र गदा त्रिशूल खड़ग निराला
हाथ में तुम पकड़ाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
नैनन कजरा केशन गजरा
नैनन कजरा केशन गजरा
कर दियो श्रृंगार ये सगरा
कर दियो श्रृंगार ये सगरा
माथे पे बिंदिया लगाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
लाल लाल चूड़ी लाल लाल साड़ी
लाल लाल चूड़ी लाल लाल साड़ी
नाक नथुनिया कमर करधनिया
नाक नथुनिया कमर करधनिया
पैरों में पेजनियाँ पहनाईयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया
खूबे सजाइयो
श्रेणी : दुर्गा भजन
नवरात्रि भजन 2026 || माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया ||
यह भजन माँ दुर्गा की प्रतिमा निर्माण और उनके श्रृंगार का अत्यंत सुंदर लोक-भक्ति वर्णन है। “माटी के दुर्गा बनाइयो कुम्हार भैया” विशेष रूप से नवरात्रि और दुर्गा पूजा के समय गाया जाने वाला एक लोकभाव से भरपूर भजन है। इसमें एक भक्त कुम्हार (मूर्तिकार) से विनती करता है कि वह माँ दुर्गा की प्रतिमा बड़े प्रेम, सुंदरता और श्रद्धा से बनाए और सजाए।
इस भजन का मुख्य भाव “श्रद्धा, उत्सव और मातृशक्ति का सौंदर्य” है। यहाँ मिट्टी से प्रतिमा बनाना केवल कला नहीं, बल्कि भक्ति का कार्य माना गया है। “माटी के दुर्गा बनाइयो” पंक्ति यह दर्शाती है कि मिट्टी की साधारण मूर्ति भी भक्तों के प्रेम और आस्था से दिव्य स्वरूप धारण कर लेती है।
भजन में माँ के वाहन “सिंह”, उनके “मुकुट”, “मोती माला”, “चक्र”, “गदा”, “त्रिशूल” और “खड़ग” का वर्णन किया गया है। ये सभी माँ दुर्गा की शक्ति, साहस और दुष्टों के विनाशकारी स्वरूप के प्रतीक हैं। साथ ही “नैनन कजरा”, “केशन गजरा”, “लाल लाल साड़ी” और “पैरों में पेजनियाँ” जैसी पंक्तियाँ देवी के सौंदर्य और श्रृंगार को बड़े प्रेम से चित्रित करती हैं।
यह भजन भारतीय लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपरा का सुंदर उदाहरण है, जहाँ मूर्ति निर्माण को केवल शिल्प नहीं बल्कि एक पवित्र साधना माना जाता है। कुम्हार यहाँ केवल कलाकार नहीं, बल्कि माँ के स्वरूप को धरती पर लाने वाला भक्त बन जाता है।
कुल मिलाकर, यह भजन माँ दुर्गा के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उत्सव की भावना को व्यक्त करता है, और यह दर्शाता है कि भक्त अपने हृदय की भक्ति से देवी को सुंदरतम रूप में सजाकर उनका स्वागत करना चाहता है।