ओ सांवरे मेरी भरदे गगरिया
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
भर दे भरा दे मेरे सर पे धरा दे,
भर दे भरा दे मेरे सर पे धरा दे,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
दिल्ली शहर में खुली है बजरिया,
दिल्ली शहर में खुली है बजरिया,
ओ सांवरे मुझसे लादे चुनरिया.,
ओ सांवरे मुझसे लादे चुनरिया,
ओढ़ पहन में अंगना में आई,
ओढ़ पहन में अंगना में आई,
ओ सांवरे मुझे लग गई नजरिया,
ओ सांवरे मुझे लग गई नजरिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
दिल्ली शहर में वैद का लड़का,
दिल्ली शहर में वैद का लड़का,
ओ सांवरे दिखला दो नवाज़िया..,
ओ सांवरे दिखला दो नवाज़िया,
वैद जी का लड़का बड़ा ही छलिया..,
वैद जी का लड़का बड़ा ही छलिया,
ओ सांवरे मुझसे मांगे ननदिया,
ओ सांवरे मुझसे मांगे ननदिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
सास मेरी ले जा जेठानी मेरी ले जा.,
सास मेरी ले जा जेठानी मेरी ले जा,
ओ सांवरे नहीं दूंगी ननदिय,
ओ सांवरे नहीं दूंगी ननदिया,
सास तेरी भुंडी जेठानी तेरी काली,
सास तेरी भुंडी जेठानी तेरी काली,
ओ राधिके तेरी गोरी है ननदिया..,
ओ राधिके तेरी गोरी है ननदिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया,
श्रेणी : कृष्ण भजन
कृष्ण भजन | ओ सांवरे मेरी भरदे गगरिया | O Saware Meri Bharde Gagariya | Krishna Bhajan 2026
यह भजन भगवान श्री कृष्ण (सांवरे) और राधा-गोपियों के बीच होने वाली हंसी-मज़ाक, प्रेम और लोकजीवन की मधुर लीलाओं को दर्शाता है। “ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया” एक लोक शैली का कृष्ण भजन है, जिसमें ब्रज और उत्तर भारतीय ग्रामीण संस्कृति की झलक दिखाई देती है। इसके रचयिता के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे पारंपरिक लोक-भक्ति रचना माना जाता है, जिसे समय के साथ अलग-अलग भजन मंडलियों ने गाया है।
इस भजन का मुख्य भाव “माधुर्य भक्ति और हास्य-रस” है। यहाँ “गगरिया” (घड़ा) केवल पानी का पात्र नहीं, बल्कि भक्त के मन और जीवन का प्रतीक भी माना जाता है। जब भक्त कहता है “ओ सांवरे मेरी भर दे गगरिया”, तो उसका अर्थ भगवान से कृपा, प्रेम और आनंद से जीवन भर देने की प्रार्थना भी होता है।
भजन में “दिल्ली शहर में खुली है बजरिया” जैसी पंक्तियाँ लोकगीतों की शैली को दर्शाती हैं, जहाँ दैनिक जीवन, बाजार, रिश्ते और पारिवारिक नोकझोंक को भक्ति के साथ जोड़ा जाता है। “सास”, “जेठानी” और “ननदिया” का उल्लेख ग्रामीण परिवारिक माहौल और स्त्रियों के आपसी मज़ाक को जीवंत बनाता है। यह शैली ब्रज लोकगीतों और रास-लीला परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है।
“वैद जी का लड़का बड़ा ही छलिया” पंक्ति में कृष्ण के “छलिया” स्वरूप का वर्णन है—यानी उनका चंचल, शरारती और मन मोह लेने वाला स्वभाव। इसी कारण भक्त उनसे शिकायत भी करता है और प्रेम भी करता है।
कुल मिलाकर, यह भजन केवल भक्ति नहीं बल्कि लोक-संस्कृति, हास्य, प्रेम और कृष्ण की रसमयी लीलाओं का सुंदर संगम है, जिसमें भक्त और भगवान का रिश्ता बहुत अपनापन और सहजता से दिखाया गया है।