सानु सद लै या साडे कोल आजा
सानु सद ले या साडे कोल आजा नित दा पवाडा मुक जे,
साडी जन्मां दी प्यास बुझा जा नित दा पवाड़ा मुकजे
रोज दा विछोडा श्याम दस किवें सहवां मैं,
तेरे भरोसे बैठी, किनु किनु कवां मैं,
साडा बन जा या अपना बना जा
साडी जन्मा दी प्यास बुझा जा के नित दा पवाड़ा मुकजे
अखियां उडीकन तैनु राह तेरी तकदी कदों दी
मैं प्यासी प्यारे प्यार नु मैं लबदी
मैनु इक वारी गल नाल ला ले
नित दा पवाड़ा...
साडी जन्मा दी ...
तेरा जेहा न कोई श्याम मैं पाया है
तेरे नाल श्यामा वे प्यार मैं पाया है
सानु आके तु दर्श दिखा जा
नित दा पवाड़ा मुकजे
साडी जन्मा दी प्यास...
श्रेणी : कृष्ण भजन
🙏Krishna #Bhajan 👌 jrur sune🙏
यह भजन भगवान श्री कृष्ण (श्याम) के प्रति गहरी विरह-भक्ति और मिलन की तड़प को व्यक्त करता है। “सानु सद लै या साडे कोल आजा” पंजाबी शैली का अत्यंत भावुक कृष्ण भजन है, जिसमें भक्त श्याम से प्रार्थना करता है कि या तो वे उसे अपने पास बुला लें, या स्वयं उसके पास आ जाएँ, ताकि जन्मों-जन्मों की प्यास और वियोग समाप्त हो सके। इसके रचयिता की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे लोक-भक्ति परंपरा की रचना माना जाता है।
इस भजन का मुख्य भाव “विरह (वियोग) और आत्मिक मिलन की चाह” है। भक्त रोज़-रोज़ के बिछोह को सहन न कर पाने की पीड़ा व्यक्त करता है—“रोज दा विछोड़ा श्याम दस किवें सहवां मैं”। यहाँ श्याम केवल एक देवता नहीं, बल्कि आत्मा के सबसे प्रिय साथी के रूप में दिखाई देते हैं। भक्त कहता है कि वह केवल श्याम के भरोसे बैठा है और उनके अलावा किसी से अपनी व्यथा नहीं कह सकता।
“अखियां उडीकन तैनु राह तेरी तकदी” पंक्ति में प्रतीक्षा और तड़प का बहुत सुंदर चित्रण है। भक्त की आँखें लगातार श्याम के दर्शन की राह देख रही हैं। “मैं प्यासी प्यारे प्यार नु” से यह भाव आता है कि आत्मा भगवान के प्रेम के बिना अधूरी और प्यासे समान है।
भजन में प्रेम का भाव अत्यंत आत्मीय है—“मैनु इक वारी गल नाल ला ले” यानी भक्त केवल एक बार भगवान के आलिंगन और अपनापन चाहता है। यह वैष्णव और माधुर्य भक्ति की उस परंपरा को दर्शाता है जहाँ भगवान और भक्त का संबंध अत्यंत निजी और प्रेमपूर्ण माना जाता है।
कुल मिलाकर, यह भजन आत्मा की भगवान कृष्ण से मिलने की तीव्र चाह, प्रेम, समर्पण और विरह की पीड़ा का सुंदर और भावनात्मक चित्रण है।