ऐ मुरली वाले जादूगर
ऐ मुरली वाले जादूगर,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
बेजान से दिल में सांवरिया,
तेरा आसन आज लगा बैठे,
ऐ मुरली वाले जादूगर,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
तेरी मुरली बड़ी निराली है,
मेरे मन को हरने वाली है,
जिसने भी सुना एक बार इसे,
सुध बुध उसकी हर डाली है,
सारी उमर सुने इसको मोहन,
ये पक्की आस लगा बैठे,
ऐ मुरली वाले जादूगर,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
सूना था कबसे दिल मेरा,
तेरी सूरत इसमें समाई है,
मुझे चाव रही नहीं दुनिया की,
ये रेहमत जबसे पाई है,
ऐसो ही बसों मन मंदिर में,
हम तुमसे नेह लगा बैठे,
ऐ मुरली वाले जादूगर,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
तू मेरा है मैं तेरा हूँ,
ये जान लिया और मान लिया,
तेरा ही बन कर रहना है,
ये दिल में पक्का ठान लिया,
है रसिक तुम्हरा सांवरिया,
चरणों में शीश झुका बैठे,
ऐ मुरली वाले जादूगर,
हम तुम पे जान लुटा बैठे,
श्रेणी : कृष्ण भजन
Murliwala 🪈 Jadugar | मुरलीवाले जादूगर | Beautiful Krishna Bhajan | Riya Sanwariya
यह भजन भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्त के अनन्य प्रेम, पूर्ण समर्पण और उनकी मधुर मुरली की दिव्य मोहिनी शक्ति का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन करता है। “ऐ मुरली वाले जादूगर” एक लोकप्रिय कृष्ण भजन है, जिसके मूल रचयिता की प्रामाणिक जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। भजन के अंतिम चरण में “रसिक” नाम का उल्लेख मिलता है, जो संभवतः कवि का उपनाम (तखल्लुस) हो सकता है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। यह भजन ब्रज की माधुर्य भक्ति परंपरा से प्रेरित है और विभिन्न भजन गायकों द्वारा गाया जाता है।
इस भजन का मुख्य भाव प्रेममयी भक्ति, आत्मसमर्पण और भगवान श्रीकृष्ण की मुरली के आध्यात्मिक आकर्षण को व्यक्त करना है। “ऐ मुरली वाले जादूगर, हम तुम पे जान लुटा बैठे” पंक्ति यह दर्शाती है कि भक्त का मन पूरी तरह भगवान के प्रेम में डूब चुका है। यहाँ “जान लुटाना” सांसारिक अर्थ में नहीं, बल्कि अपने अहंकार, इच्छाओं और सम्पूर्ण अस्तित्व को भगवान के चरणों में समर्पित करने का प्रतीक है।
भजन में श्रीकृष्ण की मुरली को दिव्य प्रेम और ईश्वर की पुकार का प्रतीक बताया गया है। “तेरी मुरली बड़ी निराली है, मेरे मन को हरने वाली है” तथा “जिसने भी सुना एक बार इसे, सुध-बुध उसकी हर डाली है” जैसी पंक्तियाँ यह भाव प्रकट करती हैं कि भगवान की कृपा और उनका नाम-स्मरण मनुष्य के मन को सांसारिक मोह से हटाकर ईश्वर की ओर आकर्षित कर देता है। यह “जादू” कोई चमत्कार नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम की शक्ति का काव्यात्मक वर्णन है।
आगे भजन में भक्त अपने हृदय को भगवान का मंदिर मानता है। “सूना था कबसे दिल मेरा, तेरी सूरत इसमें समाई है” का भाव यह है कि जब तक भगवान का प्रेम नहीं मिलता, तब तक जीवन अधूरा लगता है। लेकिन एक बार भगवान की कृपा मिल जाने पर संसार की आकर्षण शक्ति स्वतः कम हो जाती है और मन केवल प्रभु में ही आनंद खोजने लगता है।
अंतिम अंतरे में “तू मेरा है मैं तेरा हूँ” के माध्यम से भक्त और भगवान के बीच अटूट संबंध की अनुभूति व्यक्त की गई है। भक्त यह संकल्प करता है कि अब उसका जीवन केवल भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और सेवा के लिए समर्पित रहेगा। “चरणों में शीश झुका बैठे” पूर्ण विनम्रता, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का प्रतीक है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर प्रभु की शरण स्वीकार करता है।
कुल मिलाकर, यह भजन भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम, उनकी मुरली की मधुरता, हृदय में भगवान के स्थायी निवास और पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। इसका संदेश है कि जो भक्त सच्चे प्रेम और विश्वास के साथ भगवान को अपने हृदय में स्थान देता है, उसका जीवन आध्यात्मिक आनंद, शांति और दिव्य प्रेम से भर जाता है।