खेड़ापति मंदिर में म्हारा बालाजी विराजे
खेड़ापति मंदिर में म्हारा बालाजी विराजे।
बालाजी के संग मंगलदास जी विराजे।
दुनिया ने दर्शन दिज़ो गुरुवर,
भक्ता ने दर्श दिखाजोे गुरुवर।
घणी घणी खम्मा प्रभुजी, घणी घणी खम्मा,
घणी घणी खम्मा गुरुवर, घणी घणी खम्मा।
गुर थे बालाजी खेड़ापति वीर जी,
मंगल दास जी हमारे गुरुवर जी।
लाल लंगोटों थारे हाथ में सोटो,
खेड़ापति बाबा थारा नाम हे मोटो।
श्रीफल धराऊ बाबा चोलो में चढ़ाऊं,
गुड़ चना को बाबा भोग लगाऊं
यो तो दुखियारा दुखड़ा मिटावे जी,
यो तो भटक्या ने राह दिखावे जी।
घणी घणी खम्मा प्रभुजी, घणी घणी खम्मा,
घणी घणी खम्मा गुरुवर घणी घणी खम्मा।
गुरु थे बालाजी, खेड़ापति वीर जी,
मंगल दास जी, हमारे गुरुवर जी।
राम कृपा से ऐसा काम हुआ है,
खेड़ापति बाबा थारा मंदिर बना हे।
इस मंदिर में जिस ने दान दिया है,
उस भक्ता का बेड़ा पार हुआ हे।
हो थारा चरणा मे, बाबा शरणा में,
जीवनराव आया हे, अर्जी लगाए रे
घणी घणी खम्मा प्रभुजी, घणी घणी खम्मा,
घणी घणी खम्मा गुरुवर, घणी घणी खम्मा।
गुरु थे बालाजी, खेड़ापति वीर जी,
मंगल दास जी, हमारे गुरुवर जी,
श्रेणी : हनुमान भजन
Guru Hamare Bala Ji | गुरु हमारे बालाजी | Latest Bhajan | Jeevan Rao | HD Video
यह भजन हनुमान जी के खेड़ापति बालाजी स्वरूप और उनके परम भक्त एवं गुरु मंगलदास जी की महिमा का गुणगान करता है। यह राजस्थानी लोकभक्ति शैली का अत्यंत लोकप्रिय भजन है, जिसे विशेष रूप से खेड़ापति बालाजी मंदिरों में श्रद्धा और उत्साह के साथ गाया जाता है। इसके मूल रचयिता की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, जबकि इसे विभिन्न भजन गायकों ने अपने-अपने स्वर में प्रस्तुत किया है।
इस भजन का मुख्य भाव “गुरु-भक्ति, हनुमान भक्ति और कृतज्ञता” है। इसमें भक्त पहले बालाजी और फिर अपने गुरुवर मंगलदास जी को प्रणाम करता है। “घणी घणी खम्मा” राजस्थानी भाषा का सम्मान और विनम्र प्रणाम व्यक्त करने वाला शब्द है, जिसके माध्यम से भक्त बार-बार प्रभु और गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करता है।
भजन में बालाजी के स्वरूप का सुंदर वर्णन किया गया है—“लाल लंगोटों, थारे हाथ में सोटो।” लाल लंगोट हनुमान जी के ब्रह्मचर्य, बल और तपस्या का प्रतीक है, जबकि हाथ का सोटा (दंड) उनकी शक्ति और भक्तों की रक्षा करने वाले स्वरूप को दर्शाता है। श्रीफल, चोला तथा गुड़-चना अर्पित करने का उल्लेख हनुमान जी की पारंपरिक पूजा-पद्धति को दर्शाता है। इन अर्पणों के माध्यम से भक्त अपनी श्रद्धा और सेवा-भाव प्रकट करता है।
भजन में यह विश्वास भी व्यक्त किया गया है कि खेड़ापति बालाजी अपने भक्तों के दुख दूर करते हैं, भटके हुए लोगों को सही मार्ग दिखाते हैं और सच्ची श्रद्धा से आने वाले हर भक्त की रक्षा करते हैं। मंदिर निर्माण में दान देने वाले भक्तों का उल्लेख कृतज्ञता और धर्मकार्य में सहभागिता के महत्व को दर्शाता है। अंत में भक्त स्वयं को बालाजी के चरणों की शरण में रखकर अपनी विनती स्वीकार करने की प्रार्थना करता है।
कुल मिलाकर, यह भजन खेड़ापति बालाजी के प्रति अटूट आस्था, गुरु के प्रति सम्मान और पूर्ण समर्पण का सुंदर लोकभक्ति चित्रण है। इसमें यह संदेश मिलता है कि गुरु की कृपा और हनुमान जी की शरण से भक्त को जीवन में मार्गदर्शन, साहस, संकटों से रक्षा और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।