तेरी रेहमत को क्या मैं बखानू
तेरी रेहमत को क्या मैं बखानू,
रेहमतो से ही बढ़ता गया हूँ,
ढलते सूरज से दिन थे वो मेरे,
बांह पकड़ी तो चढ़ता गया हूँ,
थी अँधेरे में मेरी वो राहें,
चलता कैसे ना रोशन निगाहें,
हर कदम पे निराशा खड़ी थी,
उलझने भी तो मेरी बड़ी थी,
तेरे दामन से आया उजाला,
हर चुनौती से लड़ता गया हूँ,
यूँ तो चलता था संग मेरे मेला,
मुश्किलों में था मैं भी अकेला,
मतलबी ही ये पूरा जहाँ हैं,
साथी तुमसा ना कोई यहाँ है,
अब ना चिंता ना कोई फ़िक़रहै,
डोर तेरी पकड़ता गया हूँ,
कोई धन ना ही दौलत की आशा,
झूठी शोहरत का ना हो तमाशा,
साथ तेरा कभी भी ना छूटे,
रिश्ता राघव ये तुमसे ना टूटे,
हर कदम पे तेरा ही सहारा,
शीश चरणों में धरता गया हूँ,
श्रेणी : खाटू श्याम भजन
Teri Rehmat | Khatu Shyam Bhajan | तेरी रेहमत को क्या मैं बखानू | Official Video | Tatsha Gupta
यह भजन भगवान खाटू श्याम की असीम कृपा, रहमत और भक्त के जीवन में उनके सहारे से आए सकारात्मक परिवर्तन का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन करता है। “तेरी रहमत को क्या मैं बखानू” एक लोकप्रिय खाटू श्याम भजन है, जिसे तत्शा गुप्ता की प्रस्तुति के रूप में जाना जाता है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसके मूल गीतकार या रचनाकार का स्पष्ट और प्रामाणिक नाम ज्ञात नहीं है, इसलिए निश्चित रूप से किसी एक व्यक्ति को इसका रचयिता बताना उचित नहीं होगा।
इस भजन का मुख्य भाव भगवान की कृपा के प्रति कृतज्ञता, कठिन समय में मिले सहारे और पूर्ण आत्मसमर्पण का है। “तेरी रहमत को क्या मैं बखानू, रहमतों से ही बढ़ता गया हूँ” पंक्तियों में भक्त स्वीकार करता है कि उसके जीवन में जो भी उन्नति, सफलता और मजबूती आई है, वह उसकी अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि श्याम बाबा की कृपा से संभव हुई है। भक्त के लिए भगवान की रहमत ही उसके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
भजन के अगले अंतरे में भक्त अपने पुराने संघर्षों और कठिनाइयों को याद करता है। “ढलते सूरज से दिन थे वो मेरे” पंक्ति जीवन में निराशा और कठिन समय का प्रतीक है। जब जीवन की राहें अंधकार से भरी थीं और हर कदम पर निराशा सामने खड़ी थी, तब भगवान ने भक्त का हाथ थामा। “तेरे दामन से आया उजाला” का भाव यह है कि श्याम बाबा की शरण में आने के बाद भक्त को आशा, आत्मविश्वास और जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति प्राप्त हुई।
अगले अंतरे में संसार की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति और भगवान के सच्चे सहारे के बीच अंतर दिखाया गया है। भक्त कहता है कि सामान्य समय में उसके साथ बहुत लोग थे, लेकिन मुश्किल समय में वह अकेला रह गया। ऐसे समय में केवल भगवान का साथ ही स्थायी और सच्चा लगा। “साथी तुमसा ना कोई यहाँ है” पंक्ति भक्त के उस अटूट विश्वास को व्यक्त करती है कि संसार के रिश्ते परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं, लेकिन भगवान का साथ हमेशा बना रहता है।
अंतिम अंतरे में भक्त सांसारिक धन-दौलत और झूठी प्रसिद्धि की इच्छा को महत्व नहीं देता। उसकी सबसे बड़ी इच्छा केवल भगवान का साथ बनाए रखना है। “साथ तेरा कभी भी ना छूटे, रिश्ता राघव ये तुमसे ना टूटे” पंक्तियाँ पूर्ण समर्पण और ईश्वर के साथ अटूट संबंध की प्रार्थना हैं। “शीश चरणों में धरता गया हूँ” का भाव भक्त के अहंकार को त्यागकर भगवान के चरणों में स्वयं को समर्पित करने का प्रतीक है।
कुल मिलाकर, यह भजन भगवान की कृपा के प्रति आभार, विश्वास, समर्पण और आध्यात्मिक सहारे की भावना को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। इसका संदेश है कि जब जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं और संसार के सहारे कमजोर पड़ जाते हैं, तब भगवान की शरण भक्त को आशा और शक्ति देती है। भक्त के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि धन या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि अपने आराध्य का साथ और उनके चरणों में अटूट विश्वास बनाए रखना है।