राधा राधा जपते जपते मिलेंगे सांवरिया
राधा राधा, जपते जपते, मिलेंगे सांवरिया,
एक दिन तुझको, दर्शन देंगे, राधा के कन्हैया,
सिर पे उनके, मोर मुकुट हैं, पेरो में पायलिया,
तन पे उनके, पीला पीताम्बर, हाथो में मुरलिया,
एक दिन तुझको, दर्शन देंगे, राधा के कन्हैया,
राधा राधा, जपते जपते, मिलेंगे सांवरिया,
एक दिन तुझको, दर्शन देंगे, राधा के कन्हैया,
कितनी प्यारी, कितनी सुन्दर, वृन्दावन नगरिया,
वृन्दावन में रास रचावे, राधा संग सांवरिया,
एक दिन तुझको, दर्शन देंगे, राधा के कन्हैया,
राधा राधा, जपते जपते, मिलेंगे सांवरिया,
एक दिन तुझको, दर्शन देंगे, राधा के कन्हैया,
मैं हूँ तेरी दासी मोहन, मीरा सी जोगनिया,
मुझको भी तो दे दो दर्शन, मीरा के कन्हैया,
एक बार तो दे दो दर्शन, मीरा के कन्हैया,
राधा राधा मैं भी जपती, ओ मेरे सांवरिया,
एक बार तो दे दो दर्शन, राधा के कन्हैया,
Lyrics - Jay Prakash Verma, Indore
श्रेणी : कृष्ण भजन
राधा राधा जपते जपते मिलेंगे सांवरिया ।। श्री राधा कृष्ण भजन 2026 ।। #radhekrishna #krishnabhajan
यह “राधा राधा जपते जपते मिलेंगे सांवरिया” एक मधुर और भावपूर्ण राधा-कृष्ण भजन है, जिसमें राधा नाम के जाप और श्रीकृष्ण की भक्ति के माध्यम से सांवरिया के दर्शन प्राप्त होने की भावना व्यक्त की गई है। भजन का मुख्य संदेश है कि भक्त यदि सच्चे प्रेम और श्रद्धा से लगातार “राधा राधा” नाम का स्मरण करता रहे, तो एक दिन उसे राधा के कन्हैया श्रीकृष्ण की कृपा और दर्शन अवश्य प्राप्त होंगे। इसमें श्रीकृष्ण के मनमोहक स्वरूप का वर्णन भी किया गया है—सिर पर मोर मुकुट, पैरों में पायल, पीताम्बर और हाथों में मुरली, जो भक्त के मन में भगवान के सुंदर सांवरिया स्वरूप की छवि उत्पन्न करता है।
इस भजन का मुख्य भाव राधा नाम की महिमा, श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा, प्रेम भक्ति और पूर्ण समर्पण है। भजन में वृन्दावन की पवित्र भूमि का भी सुंदर वर्णन मिलता है, जहाँ राधा और कृष्ण के प्रेम तथा रासलीला की कल्पना की गई है। “वृन्दावन में रास रचावे, राधा संग सांवरिया” के माध्यम से भक्त उस दिव्य ब्रज वातावरण का स्मरण करता है, जहाँ राधा-कृष्ण की भक्ति और प्रेम को सर्वोच्च माना जाता है। इस कारण यह भजन केवल भगवान के रूप का वर्णन नहीं करता, बल्कि भक्त को वृन्दावन और राधा-कृष्ण की प्रेममयी भक्ति से जोड़ने का प्रयास करता है।
भजन के अंतिम हिस्से में मीरा के भक्ति भाव का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है। भक्त स्वयं को मोहन की दासी और मीरा जैसी जोगन मानकर श्रीकृष्ण से एक बार दर्शन देने की विनती करता है। यहाँ मीरा का उदाहरण निष्काम और एकनिष्ठ कृष्ण भक्ति के प्रतीक के रूप में सामने आता है। भक्त की इच्छा संसार की किसी वस्तु को पाने की नहीं, बल्कि केवल अपने सांवरिया के दर्शन करने की है। यही इस भजन की सबसे सुंदर भावना है कि सच्ची भक्ति में भक्त भगवान से केवल उनका प्रेम और सान्निध्य मांगता है।