बुला के हमको बांके बिहारी
बुला के हमको बांके बिहारी छुप गए क्यों मुरारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
दिखा दो हमको सूरत प्यारी आये शरण तुम्हारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
ओ रे संवरिया मेरे मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में,
मुझसे मिला के नज़रे चल दो बिहारी मेरे संग में,
सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी बन के तेरा पुजारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
बुला के हमको बांके बिहारी छुप गए क्यों मुरारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
ओ रे संवरिया मेरे दिल में छुपे हैं कई राज रे,
कैसे बताऊ तुमको दिल की मुरारी सब बात रे,
दिल में मेरे तुम रहते हो ओढ़ के कामल कारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
बुला के हमको बांके बिहारी छुप गए क्यों मुरारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे,
कैसा लगाया तुमने मुझको मुरारी ये रोग रे,
रोग ये दिल का तुमने लगाया सुना के बंशी प्यारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
बुला के हमको बांके बिहारी छुप गए क्यों मुरारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है,
Lyrics - Jay Prakash Verma, Indore,
श्रेणी : कृष्ण भजन
बुला के हमको बांके बिहारी छुप गए क्यों मुरारी । श्री बांके बिहारी जी का एक नया भजन । #bankebihari
यह “बुला के हमको बांके बिहारी, छुप गए क्यों मुरारी” एक भावपूर्ण श्री बांके बिहारी और कृष्ण भजन है, जिसमें भक्त भगवान श्रीकृष्ण से प्रेमपूर्ण शिकायत करता हुआ उनसे अपने दर्शन देने की विनती करता है। भजन में भक्त कहता है कि हे बांके बिहारी, आपने मुझे अपने पास बुलाया, लेकिन अब स्वयं पर्दे के पीछे क्यों छिप गए हैं? भक्त उनकी प्यारी सूरत के दर्शन करना चाहता है और स्वयं को पूरी तरह उनकी शरण में समर्पित करता है। “ये पर्दा क्यों किया है” की बार-बार पुनरावृत्ति भक्त के मन में श्रीकृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा और विरह को प्रकट करती है।
इस भजन का मुख्य भाव दर्शन की तड़प, प्रेम भक्ति, विरह और भगवान के प्रति आत्मीय शिकायत है। भक्त श्रीकृष्ण को केवल भगवान के रूप में नहीं, बल्कि अपने अत्यंत प्रिय सांवरिया के रूप में संबोधित करता है। “मुझसे मिला के नज़रे चल दो बिहारी मेरे संग में” जैसी पंक्तियों में भक्त की इच्छा है कि भगवान उसके साथ रहें और उसे अपनी सेवा का अवसर दें। वह स्वयं को उनका पुजारी और सेवक बनाकर जीवनभर उनकी सेवा करने का संकल्प व्यक्त करता है। यह भाव दास्य भक्ति और प्रेम भक्ति दोनों को दर्शाता है।
भजन के अगले हिस्से में भक्त अपने मन की गहरी भावनाओं को श्रीकृष्ण के सामने रखने का प्रयास करता है। वह कहता है कि उसके हृदय में अनेक भाव और राज छिपे हैं, लेकिन उन्हें शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। उसके लिए कृष्ण उसके दिल में ही बसे हुए हैं। “दिल में मेरे तुम रहते हो” का भाव यह दर्शाता है कि भक्त के लिए भगवान किसी दूर स्थान पर नहीं, बल्कि उसके अपने हृदय में निवास करते हैं। इस प्रकार भजन बाहरी दर्शन की इच्छा के साथ-साथ अंतरात्मा में बसे भगवान के अनुभव की भावना को भी सामने लाता है।
अंतिम अंतरे में भक्त अपनी कृष्ण-भक्ति को एक ऐसे प्रेम के रूप में प्रस्तुत करता है जिसे संसार के लोग समझ नहीं पाते। लोग उसके कृष्ण प्रेम को देखकर उसका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन भक्त को इसकी कोई चिंता नहीं है। वह मानता है कि बांसुरी की मधुर धुन ने उसके हृदय में कृष्ण प्रेम का ऐसा रोग लगा दिया है, जिससे अब वह स्वयं को अलग नहीं कर सकता। यह भाव कृष्ण भक्ति में मिलने वाले विरह और प्रेम की मधुर पीड़ा को दर्शाता है। भक्त के लिए संसार की बातें महत्वहीन हैं; उसकी एकमात्र इच्छा अपने बांके बिहारी के दर्शन और उनका प्रेम प्राप्त करना है।