उज्जैन के औघड़दानी महाकाल हैं औघड़दानी
उज्जैन के औघड़दानी, महाकाल हैं औघड़दानी,
रहे संग में उमा भवानी महारानी,
रहे संग में उमा भवानी,
उज्जैन के महाकाल की देखो महिमा बड़ी निराली,
हर एक भक्तों की भोला भर दे झोली खाली,
भस्म आरती लागे सुहानी,,
रहे संग में उमा भवानी महारानी,
रहे संग में उमा भवानी,
भोले बाबा बन गए दूल्हा दुल्हन गौरा माता,
एक डोरी में बंध गए दोनों जनमो जनम का नाता,
है पंडित ब्रह्मा ज्ञानी,
रहे संग में उमा भवानी महारानी,
रहे संग में उमा भवानी,
सर्पो का है मुकुट निराला सर्पों की है माला,
माथे पे तेरे पुण्ड शोभे पी गए विष का प्याला,
चढ़े हल्दी चन्दन पानी,
रहे संग में उमा भवानी महारानी,
रहे संग में उमा भवानी,
दोनों तरफ बैठे हैं बाराती सखियाँ मंगल गाये,
एक दूजे को फूल से मारे फेरे साथ लगाए,
शिव मिलन की सती दीवानी,
रहे संग में उमा भवानी महारानी,,
रहे संग में उमा भवानी,
मैना रानी पूजने आई शिव गौरा के चरना को,
योगेश्वरी कहे पुण्य मिला है सती तेरे जीवन को,
है राजा हिमाचल दानी,
रहे संग में उमा भवानी महारानी,
रहे संग में उमा भवानी,
श्रेणी : शिव भजन
महाकाल औघड़ दानी | Mahakaal Aughad Daani | महादेव महाशिवरात्रि 2024 लेटेस्ट भजन | by Shir Yogeshwari
यह “उज्जैन के औघड़दानी, महाकाल हैं औघड़दानी” एक भक्तिमय शिव भजन है, जिसमें भगवान महाकाल की महिमा और उनके साथ माता पार्वती के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। भजन में उज्जैन के महाकाल को औघड़दानी कहा गया है, अर्थात ऐसे भोलेनाथ जो अपने भक्तों पर सहज ही कृपा करने वाले और उनकी झोली भरने वाले हैं। इसमें महाकाल की प्रसिद्ध भस्म आरती का भी उल्लेख मिलता है, जो उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में से एक है। भजन का केंद्र महाकाल की भक्ति के साथ-साथ शिव और उमा के दिव्य मिलन का भाव है।
इस भजन का मुख्य भाव शिव भक्ति, श्रद्धा, समर्पण और भगवान शिव की दानी एवं करुणामयी छवि है। भक्त का विश्वास है कि महाकाल अपने दरबार में आने वाले भक्तों को निराश नहीं करते और उनकी खाली झोली को अपनी कृपा से भर देते हैं। “भस्म आरती लागे सुहानी” के माध्यम से महाकाल की आराधना के उस विशेष स्वरूप का वर्णन किया गया है, जिसमें भस्म से भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है। साथ ही शिव के गले में सर्प, मस्तक पर चंद्रमा और उनके द्वारा विषपान किए जाने जैसे पारंपरिक शिव स्वरूपों का भी स्मरण किया गया है।
भजन के कई अंतरे भगवान शिव और माता गौरा के विवाह प्रसंग पर आधारित हैं। इसमें शिव को दूल्हा और माता पार्वती को दुल्हन के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा उनके जन्म-जन्मांतर के दिव्य संबंध का वर्णन मिलता है। ब्रह्मा को विवाह के पंडित के रूप में और राजा हिमाचल तथा मैना रानी को इस दिव्य विवाह से जुड़े पात्रों के रूप में याद किया गया है। बारात, सखियों के मंगल गीत, फूलों से खेलना और शिव-पार्वती के फेरे जैसे प्रसंग भजन को शिव विवाह की लोकभक्ति परंपरा से जोड़ते हैं। इस कारण इसमें महाकाल की महिमा के साथ शिव-पार्वती के प्रेम और विवाह की कथा भी प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
भजन के अंतिम हिस्से में मैना रानी द्वारा शिव और गौरा के चरणों की पूजा तथा माता सती के पुण्य जीवन का भाव आता है। इससे भजन में शिव-पार्वती की कथा को और विस्तार मिलता है। कुल मिलाकर, यह रचना उज्जैन के महाकाल, भस्म आरती, भगवान शिव के औघड़ स्वरूप और शिव-पार्वती के दिव्य विवाह को एक साथ जोड़ती है। इसकी भाषा सरल, लोकभक्ति शैली की और कथा-प्रधान है, जिससे भक्तों को महाकाल की महिमा के साथ शिव विवाह के प्रसंग का भी भावपूर्ण अनुभव होता है।